Wednesday, July 8, 2020

महामारी क्यों आती है?

प्रस्तावना
जब किसी रोग का प्रकोप कुछ समय पहले की अपेक्षा बहुत अधिक होता तो उसे 'महामारी कहते हैं। महामारी किसी एक स्थान पर सीमित होती है। किन्तु यदि यह दूसरे देशों और दूसरे महाद्वीपों में भी पसर जाए तो उसे 'सार्वदेशिक रोग' कहते हैं। इसके ‌‌‌नुकसान निम्न‌ है महामारी का मुख्य कारण जीवाणु अथवा विषाणु होते हैं।
भारत में महामारियों और अकाल का प्रकोप

भारत मे सबसे अधिक कोरोना प्रभावित राज्य
कोरोना संक्रमित रोगियों के मामले में महाराष्ट्र देश का नंबर-1 राज्य है. अकेले मुंबई में इसके मरीज़ों की संख्या कुछ राज्यों के कुल रोगियों से अधिक है.
मौजूदा सरकार का रवैया मानवीय भी वैज्ञानिक भी ।

मौजूदा भारत सरकार ने लगातार वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल कर रही है. देश के भीतर मास्क जैसी जरूरी चीज को एसेंशियल कमोडिटी एक्ट के तहत ला दिया गया है ताकि इसकी कालाबाजारी न हो सके और यह सभी को मुहैया करवाए जा सकें. सरकारी से लेकर प्राइवेट लैब तक कोविड-19 की टेस्टिंग हो रही है.

हेल्पलाइन नंबर जारी किए गए हैं. जरूरी चीजें लोगों तक पहुंचाने के हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं. बड़ी तादाद में आइसोलेशन रूम्स बनाए गए हैं. लोग एक दूसरे के संपर्क में आकर संक्रमण के वाहक न बनें इसलिए एपिडेमिक डिसीज एक्ट -1897 लागू जरूर कर दिया गया है लेकिन सरकार इस संकट की घड़ी में लोगों की हर संभव मदद करने के लिए सभी कदम उठा रही है.
महामारियां आने के मुख्य कारण
(1) महामारियां आने का पहला कारण आध्यात्मिक शक्तियों का रुष्ट होना।
(2)दूसरा कारण है भक्ति का ह्वास।
(3)तीसरा कारण है पापकर्मों की बढोतरी।
(4)चौथा कारण है प्राकृतिक असंतुलन।
महामारियों से बचने का उपाय-
(1)शास्त्रानुकूल सतभक्ति
(2)हमारे कर्मो मे पापकर्मों की अपेक्षा पुण्यकर्मों की बढोतरी हो।
(3)आध्यात्मिक शक्तियों का प्रसन्न होना।
अब यह कैसे सम्भव हो?
इस वर्तमान समय में बचाने वाला एक ही संत दिखाई दे रहा है वो है संत रामपाल जी
संत रामपाल जी ही कैसे बचा सकते हैं अन्य संत क्यों नहीं?
इसके मुख्य कारण है-
(1) संत रामपाल जी शास्त्रों में प्रमाण देकर सतभक्ति बताते हैं और सतभक्ति शास्त्रानुकूल होती है जिससे आत्माओं मे शक्ति बढती है जिससे सभी आत्माएं परमात्मा की कृपा पात्र बन जाती है जिससे सभी जीव सुखमय जीवन व्यतीत करने लगते हैं।
(2)दूसरा कारण है कि शास्त्रानुकूल सतभक्ति से आध्यात्मिक शक्तियां प्रसन्न होने लगती है जिससे किसी भी प्राणी पर कोई आपदा नही आती है फलस्वरूप सभी प्राणी सुखमय जीवन व्यतीत करने लगते हैं
(3)तीसरा कारण है कि शास्त्रानुकूल सतभक्ति करने से पापकर्मों की अपेक्षा पुण्यकर्मों मे बढोतरी होती रहती है जिस कारण से भी प्राणी सुखी रहते हैं
(4)चौथा कारण है कि संत रामपाल जी पुर्ण परमात्मा के भेजे हुए मसीहा है तथा उन्ही के आदेश से सतभक्ति हेतु नाम दीक्षा प्रदान करते हैं जिससे सभी आत्माओं को बहुत से लाभ होते रहते हैं जिससे नाम दीक्षा प्राप्त प्राणी संत रामपाल जी की मर्यादा रुपी लक्ष्मण रेखा में रहते हैं जिससे उनको काल जाल से निर्भय होकर शास्त्रानुकूल सतभक्ति करते हुए सुख से अपना जीवन व्यतीत करते हैं तथा मरने के बाद मोक्ष प्राप्त करते हैं इसमे तनिक भी शंका नहीं है
इसलिए अपने मनुष्य जीवन को सफल बनाने के लिए संत रामपाल जी से दीक्षा ग्रहण करे और आजीवन मर्यादा मे रहकर सतभक्ति करे और अपने निजधाम(Satlok)चलें।
पहचानो मेरे भाईयों संत रामपाल जी आम इंसान नहीं है और संत रामपाल जी के वेश में   परमात्मा  धरती पर अवतरित है पहचानने में देर मत करो  , यह मनुष्य जीवन बार बार नहीं मिलने वाला।
जानने के लिए देखिए ईश्वर टीवी शाम8:30से9:30तक

Wednesday, July 1, 2020

विश्व गुरु कौन?

विश्व गुरु कौन बनेगा?
इतिहास के पन्नो में भारत को विश्व गुरु यानी की विश्व को पढ़ाने वाला अथवा पूरी दुनिया का शिक्षक कहा जाता था, क्योंकि भारत देश की प्राचीन अर्थव्यवस्था, राजनीती और यहाँ के लोगोंका ज्ञान इतना सम्रद्ध थी कि पूरब से लेकर पश्चिम तक सभी देश भारत के कायल थे।
भारत का वैभव
भारत की सम्रद्धता और धन को देख कर विदेशी लोग इतने लालची हो गए थे कि उन्हें भारत पर आक्रमण करना पड़ा ताकि भारत के धन से अपने भूखे पेट भर सकें।
लेकिन आज हम बात करने वाले है, भारत के विश्वगुरु होने की। 
इसलिए आज हम आप सब के सामने इसी बात को सिद्ध करने वाले हैं कि भारत ही विश्व गुरु कहलाने योग्य है।
भारत में बिभिन्न धर्म और संस्कृति के लोग होने के बावजूद भी सभी एक हैं। जो भारत को अतुल्य बनाती है।
इन सब तथ्यों के अलावा हम जानते हैं कि भारतीय नागरिक विश्व के बिभिन्न देशों में अपने ज्ञान-विज्ञान की मदद से उन्हें सहायता दे रहे हैं, और सबसे ज्यादा भारतीय तो नासा में हैं।  अतः निष्कर्ष निकालते हुए और इन सब बातों को देखते हुए कहा जा सकता है कि भारत एक बार फिर विश्व गुरु बनने के लिए तैयार है।
अमेरिका और चीन विश्व गुरु नहीं हो सकते क्योंकि इनके पास आध्यात्मिक शक्ति नहीं है और न ही विश्व के लोगों को एकता के सूत्र मे बाँधते है और न ही लोगों को शांति की राह पर लेकर चलते हैं इनका उद्देश्य विश्व के देशों में फूट डालकर अपनी वैश्विक बाजार में शक्ति बढाना है
भारत पुन:विश्वगुरु बनेगा
अत: विश्व के लोगों को शांति व भाईचारे का पाठ पढाने वाला भारत देश में जन्मा संत रामपाल जी महाराज है जो कि विश्व के लोगो शांति व भाईचारे के पाठ पढा रहे हैं यही वो संत है जो लोगों मे फैली बुराईयों को दूर करके लोगों को सुखी कर रहे हैं
(1)संत रामपाल जी महाराज एक ऐसे संत है जो सभी धर्मों के लोगों को अपना शिष्य बनाते हैं तथा उनको सतभक्ति करवाकर अपने निजधाम सतलोक मे ले जाते हैं संत रामपाल जी से पहले यह कार्य किसी भी संत ने नहीं किया।
(2)संत रामपाल जी ही एक ऐसे संत है जो कि हमारे शास्त्रों में छूपे हुए गूढ़ रहस्यों से हमें परिचित करवाया है और लोगों को एक ही ईश्वर की भक्ति बताते हैं जो कि वह कबीर परमात्मा है जो लोगों को सुखी करता है तथा वह हमारी रक्षा के लिए हर जन्म में हमारे साथ रहता है और उसका प्रत्यक्ष साक्षात्कार अपने कई शिष्यों करवाया है यह रहस्य अब तक विश्व में किसी भी संत ने नहीं खोला।
(3)संत रामपाल जी महाराज ही एक ऐसे संत है जो कि विश्व के सम्पूर्ण लोगों को बुराइयों से तथा सभी धर्मों मैं फैले अंधविश्वास को मिटा रहे हैं।जो कि यह कार्य अब तक कोई भी संत नहीं कर पाया।
(4)संत रामपाल जी महाराज एक ऐसे संत है जिनकी शरण में जाने के पश्चात किसी भी प्रकार की कोई बुराई(दहेज, मृत्युभोज,न ही किसी प्रकार का नशा, )तथा अंधविश्वास (जादू टोना, भैरव भूत बैताल की पूजा इत्यादि)नहीं करता है तथा लोगों को सही राह दिखाने के लिए तत्पर रहते हैं 
उपरोक्त विशेषताओं के आधार पर संत रामपाल जी महाराज के सानिध्य मे भारत ही विश्वगुरु बनेगा इसमें कोई संशय नहीं है
पहचानो मेरे विश्व के लोगों संत रामपाल जी महाराज ही जगत के तारणहार है।
जानने के लिए देखिए ईश्वर टीवी शाम8:30से9:30तक

Wednesday, June 24, 2020

माता पिता आदरणीय हैं।

माता पिता हमारे लिए आदरणीय है 
माता-पिता भगवान नहीं।
क्योंकि माता पिता हमें हर जन्म में मिल जाते हैं आप गधे की यौनी मे जाओगे आपको वहां भी माता पिता मिल जावेंगे इसी तरह आप चाहे कुत्ते, सुअर, बिल्ली ,गाय, भेड, बकरी किसी भी यौनी मे चले जाओगे वहां भी आपको माता पिता मिलेंगे इसलिए माता पिता की सेवा करने से केवल सेवा अर्थात् पुण्य बन जावेंगे और उसी भुगतान हमे हर जन्म में करना होता है और इसी कारण हमें बार बार जन्म लेने व मरने का असहनीय दर्द उठाना पडता है कहने का मतलब यह है कि हमें माता पिता की सेवा अवश्य करें पर भगवान मानकर नहीं बल्कि कर्तव्य जानकर करे क्योंकि उनका हमारे को जन्म देने, पालने पोषने ,पढाने लिखाने और स्वयं के पैरों पर खडा करने का बहुत कर्ज हमारे पर चढ जाता है जिसको हमें उनकी सेवा करके ही उतारना होता है अब प्रश्न यह है कि हमें इस कर्ज और आवागमन के चक्कर से कैसे मुक्त हो इसके लिए हमें पुर्ण सतगुरु बनाना होगा जैसा हमारे शास्त्रों में वर्णित है
सतगुरू के लक्षण कहुं, मधुरे बैन विनोद।
चार वेद षट शास्त्र, कह अट्ठारह बोध।।
क्योंकि
मात पिता मिल जावेंगे, लख चौरासी माही।
सतगुरु सेवा बंदगी ,फेर मिलन की नाही।।
इसलिए माता पिता हर जन्म में मिलेंगे परंतु सतगुरू व उसकी सेवा केवल मनुष्य जन्म में ही सम्भव है और बिना सतगुरु के यहा के महान कष्ट आवागमन, जन्म जन्म का कर्ज आदि से केवल सतगुरू ही बचा सकता है अगर हमने सतगुरू की शरण नहीं ली तो शरीर छूटने के बाद बहुत पछतावा होगा कबीर साहेब ने कहा है 
 कि
आछे दिन पाछे गये, किया न गुरु से हेत।
अब पछतावे क्या करें, जब चिडिया चुग गई खेत।।
माता पिता हमारे लिए आदरणीय है 
माता-पिता की सेवा क्यों करनी चाहिए?
 माँ-बाप की सेवा अवश्य करने योग्य है। क्योंकि यदि आप सेवा नहीं करोगे, तो आप किस की सेवा पाओगे? आपकी आनेवाली पीढ़ी कैसे सीखेगी कि आप सेवा करने लायक हो? बच्चे सब देखा करते हैं। वे देखेंगे कि हमारे फादर ने कभी उनके बाप की सेवा नहीं की है! फिर संस्कार तो नहीं ही पड़ेंगे न?
इसलिए सतगुरु बडा होता है और आज इस धरती पर सतगुरु केवल संत रामपाल जी महाराज ही है उनकी बताई गई सतभक्ति और मर्यादा का पालन करके इस जन्म मरण के चक्कर से मुक्त हो सकते हैं इसलिए देर न करो भाइयों संत रामपाल जी महाराज को पहचान कर अपना कल्याण करवालो।
जानने के लिए देखिए साधना टीवी शाम7:30से8:30तक

Wednesday, June 17, 2020

श्री कृष्ण जी

यह अवधारणा थी की द्रौपदी की साडी कृष्ण जी ने बढाई थी,यह अर्ध सत्य है| सत्य तो यह है कि उस समय श्री कृष्ण जी रुक्मणी के साथ चौसर खेल रहे थे|ये सारा खेल कबीर भगवान ने किया और भक्ति की लाज रखी द्रौपदी की साडी बढाकर।
जानने के लिए देखिए ईश्वर टीवी शाम8:30से9:30तक
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Wednesday, June 10, 2020

*पवित्र बाइबिल मे परमेश्वर साकार है और नराकार है।*

*परमेश्वर ने छ:दिन में सृष्टि रचकर सातवें दिन तख्त पर जा बैठा*अर्थात् सशरीर है ।
बाइबिल के अनुसार
(उत्पत्ति ग्रन्थ पृष्ठ नं. 2 पर, अ. 1:20 - 2:5 पर)

छटवां दिन:- प्राणी और मनुष्य:

अन्य प्राणियों की रचना करके

26. फिर परमेश्वर ने कहा, हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाऐं, जो सर्व प्राणियों को काबू रखेगा।

27. तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया, नर और नारी करके मनुष्यों की सृष्टी की।

29. प्रभु ने मनुष्यों के खाने के लिए जितने बीज वाले छोटे पेड़ तथा जितने पेड़ों में बीज वाले फल होते हैं वे भोजन के लिए प्रदान किए हैं, माँस खाना नहीं कहा है।

सातवां दिन:- विश्राम का दिन:

परमेश्वर ने छः दिन में सर्व सृष्टी की उत्पत्ति की तथा सातवें दिन विश्राम किया।

पवित्र बाईबल ने सिद्ध कर दिया कि परमात्मा मानव सदृश शरीर में है, जिसने छः दिन में सर्व सृष्टी की रचना की तथा फिर विश्राम किया।

उत्पति विषय में लिखा है कि परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया। इससे सिद्ध है कि प्रभु भी मनुष्य जैसे शरीर युक्त है तथा छः दिन में सृष्टी रचना करके सातवें दिन तख्त पर जा विराजा।

*पवित्र बाइबिल के अनुसार परमात्मा कबीर है।*

» ईसाई धर्म में पूर्ण परमात्मा (बाइबिल के अनुसार) » पवित्र बाइबिल अय्यूब 36: 5 के अनुसार पूर्ण परमात्मा
पवित्र बाइबिल अय्यूब 36: 5 के अनुसार पूर्ण परमात्मा
अय्यूब 36:5 (और्थोडौक्स यहूदी बाइबल - OJB)
परमेश्वर कबीर (शक्तिशाली) है, किन्तु वह लोगों से घृणा नहीं करता है।
परमेश्वर कबीर (सामर्थी) है और विवेकपूर्ण है।

बाइबल ने भी स्पष्ट किया है की प्रभु का नाम कबीर है।

अनुवाद कर्ताओ नें कबीर की जगह शक्तिशाली व सामर्थ वाला लिख दिया है। वास्तव में परमात्मा का नाम कबीर है। वेदो में, भगवद गीता में, श्री गुरु ग्रंथ साहिब में और कुरान शरीफ में भी परमात्मा का नाम कबीर है।
*अनेक प्रभुओं का प्रमाण - पवित्र बाईबल*
3:22. फिर यहोवा प्रभु ने (उत्पति अध्याय 3:22 तथा 17:1 तथा 18:1 से 5 तथा 16 से 23 तथा 26.29.32.33 में) कहा मनुष्य भले-बुरे का ज्ञान पाकर हम में से एक के समान हो गया है। इसलिए ऐसा न हो कि यह जीवन के वृक्ष वाला फल भी तोड़ कर खा ले और सदा जीवित रहे।

उत्पति ग्रन्थ के अध्याय 17 श्लोक 1 (17:1) में कहा है कि जब अब्राम निन्यानवे (99) वर्ष का हो गया तब यहोवा ने उसको दर्शन दे कर कहा ‘‘मैं सर्वशक्तिमान हुँ। मेरी उपस्थिति में चल और सिद्ध होता जा’’ फिर उत्पति ग्रन्थ के अध्याय 18 श्लोक 1 से 10 तथा अध्याय 19 श्लोक 1 से 25 में तीन प्रभुओं का प्रमाण है।

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि आदम जी का प्रभु कह रहा है कि आदम को भले बुरे का ज्ञान होने से हम में से एक के समान हो गया है। इससे सिद्ध हुआ कि ऐसे प्रभु और भी हैं जब कि इसाई धर्म के श्रद्धालु कहते है परमात्मा एक है तथा यह भी प्रमाणित हुआ कि परमात्मा साकार है मनुष्य जैसा है।

उत्पति ग्रन्थ अध्याय 3 के श्लोक 23. व 24. इसलिए प्रभु ने आदम व उसकी पत्नी को अदन के उद्यान से निकाल दिया।

काल प्रभु ने उनको उस वाटिका से निकाल दिया और कहा कि अब तुम्हें यहाँ नहीं रहने दूँगा और तुझे अपना पेट भरने के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ेगा और औरत को श्राप दिया कि तू हमेशा आदमी के पराधीन रहेगी।

{विशेष:- श्री मनु जी के पुत्र इक्ष्वाकु तथा इसी वंश में राजा नाभीराज हुए। राजा नाभीराज के पुत्र श्री ऋषभदेव जी हुए जो पवित्र जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर माने जाते हैं। यही श्री ऋषभदेव जी की पवित्रत्मा बाबा आदम हुए। जैन धर्म के सद्ग्रन्थ ‘‘आओ जैन धर्म को जाने‘‘ पृष्ठ 154 में लिखा है।} आदम व हव्वा के संयोग से दो पुत्र उत्पन्न हुए। एक का नाम काईन तथा दूसरे का नाम हाबिल रखा। काईन खेती करता था। हाबिल भेड़-बकरियाँ चराया करता था। काईन कुछ धुर्त था परन्तु हाबिल ईश्वर पर विश्वास करने वाला था। काईन ने अपनी फसल का कुछ अंश प्रभु को भेंट किया। प्रभु ने अस्वीकार कर दिया। फिर हाबिल ने अपने भेड़ के पहले मेमने को प्रभु को भेंट किया, प्रभु ने स्वीकार किया। {यदि बाबा आदम में प्रभु बोल रहा होता तो कहता कि बेटा हाबिल मैं तेरे से प्रसन्न हूँ। आप ने जो मैमना भेंट किया यह आप की प्रभु के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है। यह आप ही ले जाईये और इसे बेच कर धर्म (भण्डारा) कीजिए और अपनी भेड़ों की ऊन उतार कर रोजी-रोटी चलाईये तथा प्रभु में विश्वास रखिये। यह बाबा आदम के शरीर में प्रेतवत प्रवेश करके कोई प्रेत व पितर बोल रहा था तथा इसी प्रकार पवित्र बाईबल में माँस खाने का प्रावधान पित्तरों ने किसी नबी में बोल कर करवाया है।}

इस से काईन को द्वेष हुआ तथा अपने छोटे भाई को मार दिया। कुछ समय के बाद आदम व हव्वा से एक पुत्र हुआ उसका नाम सेत रखा। सेत को फिर पुत्र हुआ उसका नाम एनोस रखा। उस समय से लोग प्रभु का नाम लेने लगे।

विचार करें - जहाँ से पवित्र ईसाई व मुसलमान धर्म प्रथम पुरूष के वंश की शुरूआत हुई वहीं से मार-काट लोभ और लालच द्वेष परिपूर्ण है। आगे चलकर इसी परंपरा में ईसा मसीह जी का जन्म हुआ। इनकी पूज्य माता जी का नाम मरियम तथा पूज्य पिता जी का नाम यूसुफ था। परन्तु मरियम को गर्भ एक देवता से रहा था। इस पर यूसुफ ने आपत्ति की तथा मरियम को त्यागना चाहा तो स्वपन में (फरिश्ते) देवदूत ने ऐसा न करने को कहा तथा यूसुफ ने डर के मारे मरियम का त्याग न करके उसके साथ पति-पत्नी रूप में रहे। देवता से गर्भवती हुई मरियम ने ईसा को जन्म दिया। हजरत ईसा से पवित्र ईसाई धर्म की स्थापना हुई। ईसा मसीह के नियमों पर चलने वाले भक्त आत्मा ईसाई कहलाए तथा पवित्र ईसाई धर्म का उत्थान हुआ।

प्रमाण के लिए कुरान शरीफ में सूरः मर्यम-19 में तथा पवित्र बाईबल में मती रचित सुसमाचार मती=1:25 पृष्ठ नं. 1-2 पर।

हजरत ईसा जी को भी पूर्ण परमात्मा सत्यलोक से आकर मिले तथा एक परमेश्वर का मार्ग समझाया। इसके बाद ईसा जी एक ईश्वर की भक्ति समझाने लगे। लोगों ने बहुत विरोध किया। फिर भी वे अपने मार्ग से विचलित नहीं हुए। परन्तु बीच-बीच में ब्रह्म(काल/ज्योति निरंजन) के फरिश्ते हजरत ईसा जी को विचलित करते रहे तथा वास्तविक ज्ञान को दूर रखा।

हजरत यीशु का जन्म तथा मृत्यु व जो जो भी चमत्कार किए वे पहले ब्रह्म(ज्योति निरंजन) के द्वारा निर्धारित थे। यह प्रमाण पवित्र बाईबल में है कि एक व्यक्ति जन्म से अंधा था। वह हजरत यीशु मसीह के पास आया। हजरत जी के आशीर्वाद से उस व्यक्ति की आँखें ठीक हो गई। शिष्यों ने पूछा हे मसीह जी इस व्यक्ति ने या इसके माता-पिता ने कौन-सा ऐसा पाप किया था जिस कारण से यह अंधा हुआ तथा माता-पिता को अंधा पुत्र प्राप्त हुआ। यीशु जी ने कहा कि इसका कोई पाप नहीं है जिसके कारण यह अंधा हुआ है तथा न ही इसके माता-पिता का कोई पाप है जिस कारण उन्हें अंधा पुत्र प्राप्त हुआ। यह तो इसलिए हुआ है कि प्रभु की महिमा प्रकट करनी है। भावार्थ यह है कि यदि पाप होता तो हजरत यीशु आँखे ठीक नहीं कर सकते थे। यह सब काल ज्योति निरंजन (ब्रह्म) का सुनियोजित जाल है। जिस कारण उसके द्वारा भेजे अवतारों की महिमा बन जाए तथा आस पास के सभी प्राणी उस पर आसक्त होकर उसके द्वारा बताई ब्रह्म साधना पर अटल हो जाऐं। जब परमेश्वर का संदेशवाहक आए तो कोई भी विश्वास न करे। जैसे हजरत ईसा मसीह के चमत्कारों में लिखा है कि एक प्रेतात्मा से पीडि़त व्यक्ति को ठीक कर दिया। यह काल स्वयं ही किसी प्रेत तथा पित्तर को प्रेरित करके किसी के शरीर में प्रवेश करवा देता है। फिर उसको किसी के माध्यम से अपने भेजे दूत के पास भेजकर प्रेत को भगा देता है। उसके अवतार की महिमा बन जाती है। या कोई साधक पहले का भक्ति युक्त होता है। उससे भी ऐसे चमत्कार उसी की कमाई से करवा देता है तथा उस साधक की महिमा करवा कर हजारों को उसका अनुयाई बनवा कर काल जाल में फंसा देता है तथा उस पूर्व भक्ति कमाई युक्त साधक की कमाई को समाप्त करवा कर नरक में डाल देता है।

इसी तरह का उदाहरण पवित्र बाईबल ‘शमूएल‘ नामक अध्याय 16:14-23 में है कि शाऊल नामक व्यक्ति को एक प्रेत दुःखी करता था। उसके लिए बालक दाऊद को बुलाया जिससे उसको कुछ राहत मिलती थी। क्योंकि हजरत दाऊद भी ज्योति निरंजन का भेजा हुआ पूर्व शक्ति युक्त साधक पूर्व की भक्ति कमाई वाला था। जिसको ‘जबूर‘ नामक किताब ज्योति निरंजन/ब्रह्म ने बड़ा होने पर उतारी।

हजरत ईसा मसीह की मृत्यु 30 वर्ष की आयु में हुई जो पूर्व ही निर्धारित थी। स्वयं ईसा जी ने कहा कि मेरी मृत्यु निकट है तथा तुम (मेरे बारह शिष्यों) में से ही एक मुझे विरोधियों को पकड़वाएगा। उसी रात्री में सर्व शिष्यों सहित ईसा जी एक पर्वत पर चले गए। वहाँ उनका दिल घबराने लगा। अपने शिष्यों से कहा कि आप जागते रहना। मेरा दिल घबरा रहा है। मेरा जी निकला जा रहा है। मुझे सहयोग देना। ऐसा कह कर कुछ दूरी पर जाकर मुंह के बल पृथ्वी पर गिरकर प्रार्थना की (38,39), वापिस चेलों के पास लौटे तो वे सो रहे थे। यीशु ने कहा क्या तुम मेरे साथ एक पल भी नहीं जाग सकते। जागते रहो, प्रार्थना करते रहो, ताकि तुम परीक्षा में फेल न हो जाओ। मेरी आत्मा तो मरने को तैयार है, परन्तु शरीर दुर्बल है। इसी प्रकार यीशु मसीह ने तीन बार कुछ दूर जाकर प्रार्थना की तथा फिर वापिस आए तो सभी शिष्यांे को तीनों बार सोते पाया। ईसा मसीह के प्राण जाने को थे, परन्तु चेले राम मस्ती में सोए पड़े थे। गुरु जी की आपत्ति का कोई गम नहीं।

तीसरी बार भी सोए पाया तब कहा मेरा समय आ गया है, तुम अब भी सोए पड़े हो। इतने में तलवार तथा लाठी लेकर बहुत बड़ी भीड़ आई तथा उनके साथ एक ईसा मसीह का खास यहूंदा इकसरौती नामक शिष्य था, जिसने तीस रूपये के लालच में अपने गुरु जी को विरोधियों के हवाले कर दिया।(मत्ती 26:24-55 पृष्ठ 42-44)

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि पुण्यात्मा ईसा मसीह जी को केवल अपना पूर्व का निर्धारित जीवन काल प्राप्त हुआ जो उनके विषय में पहले ही पूर्व धर्म शास्त्रों में लिखा था। "मत्ती रचित समाचार" पष्ठ 1 पर लिखा है कि याकुब का पुत्र युसूफ था। युसूफ ही मरियम का पति था। मरियम को एक फरिश्ते से गर्भ रहा था। तब हजरत ईसा जी का जन्म हुआ समाज की दृष्टि में ईसा जी के पिता युसूफ थे। (मत्ती 1:1-18)

तीस (30) वर्ष की आयु में ईसा मसीह जी को शुक्रवार के दिन सलीब मौत (दीवार) के साथ एक †† आकार के लकड़ के ऊपर ईसा को खड़ा करके हाथों व पैरों में मेख (मोटी कील) गाड़ दी। जिस कारण अति पीड़ा से ईसा जी की मृत्यु हुई। तीसरे दिन रविवार को ईसा जी फिर से दिखाई देने लगे। 40 दिन (चालीस) कई जगह अपने शिष्यों को दिखाई दिए। जिस कारण भक्तों में परमात्मा के प्रति आस्था दृढ़ हुई। वास्तव में पूर्ण परमात्मा ने ही ईसा जी के रूप में प्रकट होकर प्रभु भक्ति को जीवित रखा था। काल तो चाहता है यह संसार नास्तिक हो जाए। परन्तु पूर्ण परमात्मा ने यह भक्ति वर्तमान समय तक जीवित रखनी थी। अब यह पूर्ण रूप से फैलेगी। उस समय के शासक(गवर्नर) पिलातुस को पता था कि ईसा जी निर्दोष हैं परन्तु फरीसियों अर्थात् मूसा के अनुयाईयों के दबाव में आकर सजा सुना दी थी।
*पवित्र बाइबिल मे माँस खाना परमेश्वर का आदेश नहीं।*
» ईसाई धर्म में पूर्ण परमात्मा (बाइबिल के अनुसार) » भगवान ने मनुष्य को शाकाहारी भोजन खाने के आदेश दिये हैं - पवित्र बाइबल
भगवान ने मनुष्य को शाकाहारी भोजन खाने के आदेश दिये हैं - पवित्र बाइबल
पवित्र बाइबल - उत्पत्ति 
1:29 - फिर परमेश्वर ने उन से कहा, सुनो, जितने बीज वाले छोटे छोटे पेड़ सारी पृथ्वी के ऊपर हैं और जितने वृक्षों में बीज वाले फल होते हैं, वे सब मैं ने तुम को दिए हैं; वे तुम्हारे भोजन के लिये हैं: 

1:30 - और जितने पृथ्वी के पशु, और आकाश के पक्षी, और पृथ्वी पर रेंगने वाले जन्तु हैं, जिन में जीवन के प्राण हैं, उन सब के खाने के लिये मैं ने सब हरे हरे छोटे पेड़ दिए हैं; और वैसा ही हो गया।
आज सर्व भक्त समाज धर्म गुरू समाज सेवी संस्थाएं शास्त्राविधि को छोड़ कर मनमानी पूजा अर्चना करा
रहे है यानि अज्ञान के कारण शास्त्र विरूद्ध साधना से भक्ति करने वाले का अनमोल मानव (स्त्री-पुरूष का) जीवन नष्ट हो रहा है जो साधक शास्त्राविधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है यानि किसी को देखकर या किसी के कहने से भक्ति साधना करता है तो उसको न तो कोई सुख प्राप्त होता है, न कोई सिद्धि यानि भक्ति की शक्ति प्राप्त होती है, न उसकी गति होती है। इन्हीं तीन लाभों के लिए साधक साधना करता है जिस कारण से समाज नास्तिक होता जा रहा हैं ।आज शास्त्र अनुकूल साधना केवल संत रामपाल जी महाराज के पास ही है। आप से विनती है
कि उनसे दीक्षा लेकर अपना व परिवार का कल्याण करवाए व शास्त्र विपरीत साधना कर रहे हो, उसे तुरंत त्याग दो।
जानने के लिए देखिए साधना टीवी शाम7:30से8:30तक

Sunday, June 7, 2020

जो परमात्मा को दो समझते हैं वो अज्ञानी है।

अति आधीन दीन हो प्राणी, ताते कहिए ये अकथ कहानी।‘‘
उच्चे पात्र जल ना जाई, ताते नीचा हुजै भाई।
आधीनी के पास हैं पूर्ण ब्रह्म दयाल।
मान बड़ाई मारिए बे अदबी सिर काल।।
कबीर परमेश्वर ने यहाँ पर एक तीर से दो शिकार किए। स्वामी रामानंद
जी में धर्म भेद-भाव की भावना शेष थी, वह भी निकालनी थी। रामानंद जी
मुसलमानां को हिन्दूओं से अभी भी भिन्न तथा हेय मानते थे। सिकंदर में
अहंकार की भावना थी। यदि वह नम्र नहीं होता तो कबीर साहेब कृपा नहीं
करते तथा सिकंदर स्वस्थ नहीं होता} बीर सिंह को देखकर तथा डरते हुए
सिकंदर लौधी ने भी दण्डवत् प्रणाम किया। कबीर परमेश्वर जी ने दोनों के
सिर पर हाथ रखा और कहा कि दो-2 नरेश आज मुझ गरीब के पास कैसे
आए हैं? मुझ गरीब को कैसे दर्शन दिए? परमेश्वर कबीर जी ने अपना हाथ
उठाया भी नहीं था कि सिकंदर का जलन का रोग समाप्त हो गया। सिकंदर
लौधी की आँखों में पानी आ गया। (संत के सामने यह मन भाग जाता है और
ये आत्मा ऊपर आ जाती है क्योंकि परमात्मा आत्मा का साथी है। ‘‘अन्तरयामी
एक तू आत्म के आधार।‘‘ आत्मा का आधार कबीर भगवान है।) सिकंदर
लौधी ने पैर पकड़ कर छोड़े नहीं और रोता ही रहा। परमेश्वर जानी जान
होते हुए भी कबीर साहेब ने सिकन्दर लोधी दिल्ली के बादशाह से पूछा क्या
बात है?। सिकंदर ने कहा कि दाता मैंने घोर अपराध कर दिया। आप मुझे
क्षमा नहीं कर सकते। जिस काम के लिए मैं आया था वह असाध्य रोग तो
आपके स्पर्श मात्र से ठीक हो गया। इस पापी को क्षमा कर दो। कबीर साहेब
ने कहा क्षमा कर दिया। यह तो बता कि क्या हुआ? सिकंदर ने कहा कि आप
क्षमा कर नहीं सकते। मैंने ऐसा पाप किया है। कबीर साहेब ने कहा कि क्षमा
कर दिया। सिकंदर ने फिर कहा कि सच में माफ कर दिया? कबीर साहेब
ने कहा कि हाँ क्षमा कर दिया। अब बता क्या कष्ट है? सिकंदर ने कहा कि
दाता मुझ पापी ने गुस्से में आकर आपके गुरुदेव का सिर कलम कर दिया
और फिर सारी कहानी बताई। कबीर साहेब बोले कोई बात नहीं। जो हुआ
प्रभु इच्छा से ही हुआ है आप स्वामी रामानन्द जी का अन्तिम संस्कार करवा
कर जाना नहीं तो आप निंदा के पात्रा बनोगे। परमेश्वर कबीर साहेब जी
नाराज नहीं हुए। सिकंदर लोधी ने बीर सिंह के मुख की और देखा और कहा
कि बीर सिंह यह तो वास्तव में भगवान है। देखिए मैंने गुरुदेव का सिर काट
दिया और कबीर जी को क्रोध भी नहीं आया। बीर सिंह चुप रहा और
साथ-साथ हो लिया और मन ही मन में सोचता है कि अभी क्या है, अभी तो
और देखना। यह तो शुरूआत है।
स्वामी रामानन्द जी को जीवित करना”
 परमेश्वर कबीर जी ने अन्दर जाकर देखा रामानंद जी का धड़ कहीं पर
और सिर कहीं पर पड़ा था। शरीर पर चादर डाल रखी थी। कबीर साहेब ने
अपने गुरुदेव के मृत शरीर को दण्डवत् प्रणाम किया और चरण छुए तथा
कहा कि गुरुदेव उठो। दिल्ली के बादशाह आपके दर्शनार्थ आए हैं। एक बार
उठना। दूसरी बार ही कहा था, सिर अपने आप उठकर धड़ पर लग गया
और रामानन्द जी जीवित हो गए “बोलो सतगुरु देव की जय”।
सर्व मनुष्य एक प्रभु के बच्चे हैं, जो दो मानता है
वह अज्ञानी है”
रामानंद जी के शरीर से आधा खून और आधा दूध निकला हुआ था। जब
साहेब कबीर से स्वामी रामानन्द जी ने कारण पूछा तो साहेब ने बताया कि
स्वामी जी आपके अन्दर यह थोड़ी-सी कसर और रह रही है कि अभी तक
आप हिन्दू और मुसलमान को दो समझते हो। इसलिए आधा खून और आधा
दूध निकला है। आप अन्य जाति वालों को अपना साथी समझ चुके हो। यह
जीव सभी एक हैं। आप तो जानीजान हो। आप तो लीला कर रहे हो अर्थात्
उसको गोल-मोल भी कर दिया और समझा भी गए।
कबीर-अलख इलाही एक है, नाम धराया दोय।
कहै कबीर दो नाम सुनि, भरम परो मति कोय।।1।।
कबीर-राम रहीमा एक है, नाम धराया दोय।
कहै कबीर दो नाम सुनि, भरम परो मति कोय।।2।।
कबीर-कृष्ण करीमा एक है, नाम धराया दोय।
कहै कबीर दो नाम सुनि, भरम परो मति कोय।।3।।
कबीर-काशी काबा एक है, एकै राम रहीम।
मैदा एक पकवान बहु, बैठि कबीरा जीम।।4।।
कबीर-एक वस्तु के नाम बहु, लीजै वस्तु पहिचान।
नाम पक्ष नहीं कीजिये, सार तत्व ले जान।।5।।
कबीर-सब काहूका लीजिये, सांचा शब्द निहार।
पक्षपात ना कीजिये, कहै कबीर विचार।।6।।
कबीर-राम कबीरा एक है, दूजा कबहू ना होय।
अंतर टाटी कपट की, तातै दीखे दोय।।7।।
कबीर-राम कबीर एक है, कहन सुनन को दोय।
दो करि सोई जानई, सतगुरु मिला न होय।।8।।
रामानंद जी ने सिकंदर को सीने से लगाया तथा उसके बाद हिन्दू तथा
मुसलमान को तथा सर्व जाति व धर्मों के व्यक्तियों को प्रभु के बच्चे जानकर
प्यार देने लगे तथा अपने औपचारिक शिष्य वास्तव में परमेश्वर कबीर साहेब
जी का धन्यवाद किया कि आपने मेरा अज्ञान पूर्ण रूप से दूर कर दिया। हम
एक पिता प्रभु की संतान हैं, मुझे दृढ़ विश्वास हो गया। दिल्ली के बादशाह
सिकंदर लोधी के साथ उनका धार्मिक गुरु शेखतकी भी बनारस गया था। वह
रैस्ट हाऊस(विश्राम गृह) में ही रूका था। क्योंकि शेखतकी हिन्दू संतों से बहुत
ईर्ष्या करता था तथा उन्हें व उनके शिष्यों को काफिर कहता था। इसलिए
स्वामी रामानन्द जी के आश्रम में जाने से इंकार कर दिया था। राजा सिकंदर
लोधी के साथ स्वामी रामानन्द जी के आश्रम में नहीं गया था।
महाराजा सिकंदर ने विश्राम गृह में आकर परमेश्वर कबीर साहेब जी
द्वारा अपने असाध्य रोग का निवारण केवल आशीर्वाद मात्रा से करने तथा
स्वामी रामानन्द जी को पुनर् जीवित करने की कथा खुशी के साथ अपने
धार्मिक पीर शेखतकी को बताई तथा कहा कि पीर जी मैं पूर्ण रूप से स्वस्थ
हूँ। मेरे किसी अंग में कोई पीड़ा नहीं है। रात्रि का समय था। प्रभु कबीर साहेब
जी सुबह आने की कहकर अपनी कुटिया पर चले गये थे।
शेखतकी ने बादशाह के मुख से अन्य संत की भुरि-भुरि प्रशंसा सुनी तो
अन्दर ही अन्दर जल-भुन गया। रात भर करवटें बदलता रहा। परमेश्वर
कबीर साहेब जी को नीचा दिखाने की योजना बनाता रहा।
जानने के लिए देखिए साधना टीवी शाम7:30से8:30तक

महामारी क्यों आती है?

प्रस्तावना जब किसी रोग का प्रकोप कुछ समय पहले की अपेक्षा बहुत अधिक होता तो उसे 'महामारी कहते हैं। महामारी किसी एक स्थान पर सीमित होती है...