अति आधीन दीन हो प्राणी, ताते कहिए ये अकथ कहानी।‘‘
उच्चे पात्र जल ना जाई, ताते नीचा हुजै भाई।
आधीनी के पास हैं पूर्ण ब्रह्म दयाल।
मान बड़ाई मारिए बे अदबी सिर काल।।
कबीर परमेश्वर ने यहाँ पर एक तीर से दो शिकार किए। स्वामी रामानंद
जी में धर्म भेद-भाव की भावना शेष थी, वह भी निकालनी थी। रामानंद जी
मुसलमानां को हिन्दूओं से अभी भी भिन्न तथा हेय मानते थे। सिकंदर में
अहंकार की भावना थी। यदि वह नम्र नहीं होता तो कबीर साहेब कृपा नहीं
करते तथा सिकंदर स्वस्थ नहीं होता} बीर सिंह को देखकर तथा डरते हुए
सिकंदर लौधी ने भी दण्डवत् प्रणाम किया। कबीर परमेश्वर जी ने दोनों के
सिर पर हाथ रखा और कहा कि दो-2 नरेश आज मुझ गरीब के पास कैसे
आए हैं? मुझ गरीब को कैसे दर्शन दिए? परमेश्वर कबीर जी ने अपना हाथ
उठाया भी नहीं था कि सिकंदर का जलन का रोग समाप्त हो गया। सिकंदर
लौधी की आँखों में पानी आ गया। (संत के सामने यह मन भाग जाता है और
ये आत्मा ऊपर आ जाती है क्योंकि परमात्मा आत्मा का साथी है। ‘‘अन्तरयामी
एक तू आत्म के आधार।‘‘ आत्मा का आधार कबीर भगवान है।) सिकंदर
लौधी ने पैर पकड़ कर छोड़े नहीं और रोता ही रहा। परमेश्वर जानी जान
होते हुए भी कबीर साहेब ने सिकन्दर लोधी दिल्ली के बादशाह से पूछा क्या
बात है?। सिकंदर ने कहा कि दाता मैंने घोर अपराध कर दिया। आप मुझे
क्षमा नहीं कर सकते। जिस काम के लिए मैं आया था वह असाध्य रोग तो
आपके स्पर्श मात्र से ठीक हो गया। इस पापी को क्षमा कर दो। कबीर साहेब
ने कहा क्षमा कर दिया। यह तो बता कि क्या हुआ? सिकंदर ने कहा कि आप
क्षमा कर नहीं सकते। मैंने ऐसा पाप किया है। कबीर साहेब ने कहा कि क्षमा
कर दिया। सिकंदर ने फिर कहा कि सच में माफ कर दिया? कबीर साहेब
ने कहा कि हाँ क्षमा कर दिया। अब बता क्या कष्ट है? सिकंदर ने कहा कि
दाता मुझ पापी ने गुस्से में आकर आपके गुरुदेव का सिर कलम कर दिया
और फिर सारी कहानी बताई। कबीर साहेब बोले कोई बात नहीं। जो हुआ
प्रभु इच्छा से ही हुआ है आप स्वामी रामानन्द जी का अन्तिम संस्कार करवा
कर जाना नहीं तो आप निंदा के पात्रा बनोगे। परमेश्वर कबीर साहेब जी
नाराज नहीं हुए। सिकंदर लोधी ने बीर सिंह के मुख की और देखा और कहा
कि बीर सिंह यह तो वास्तव में भगवान है। देखिए मैंने गुरुदेव का सिर काट
दिया और कबीर जी को क्रोध भी नहीं आया। बीर सिंह चुप रहा और
साथ-साथ हो लिया और मन ही मन में सोचता है कि अभी क्या है, अभी तो
और देखना। यह तो शुरूआत है।
स्वामी रामानन्द जी को जीवित करना”
परमेश्वर कबीर जी ने अन्दर जाकर देखा रामानंद जी का धड़ कहीं पर
और सिर कहीं पर पड़ा था। शरीर पर चादर डाल रखी थी। कबीर साहेब ने
अपने गुरुदेव के मृत शरीर को दण्डवत् प्रणाम किया और चरण छुए तथा
कहा कि गुरुदेव उठो। दिल्ली के बादशाह आपके दर्शनार्थ आए हैं। एक बार
उठना। दूसरी बार ही कहा था, सिर अपने आप उठकर धड़ पर लग गया
सर्व मनुष्य एक प्रभु के बच्चे हैं, जो दो मानता है
वह अज्ञानी है”
रामानंद जी के शरीर से आधा खून और आधा दूध निकला हुआ था। जब
साहेब कबीर से स्वामी रामानन्द जी ने कारण पूछा तो साहेब ने बताया कि
स्वामी जी आपके अन्दर यह थोड़ी-सी कसर और रह रही है कि अभी तक
आप हिन्दू और मुसलमान को दो समझते हो। इसलिए आधा खून और आधा
दूध निकला है। आप अन्य जाति वालों को अपना साथी समझ चुके हो। यह
जीव सभी एक हैं। आप तो जानीजान हो। आप तो लीला कर रहे हो अर्थात्
उसको गोल-मोल भी कर दिया और समझा भी गए।
कबीर-अलख इलाही एक है, नाम धराया दोय।
कहै कबीर दो नाम सुनि, भरम परो मति कोय।।1।।
कबीर-राम रहीमा एक है, नाम धराया दोय।
कहै कबीर दो नाम सुनि, भरम परो मति कोय।।2।।
कबीर-कृष्ण करीमा एक है, नाम धराया दोय।
कहै कबीर दो नाम सुनि, भरम परो मति कोय।।3।।
कबीर-काशी काबा एक है, एकै राम रहीम।
मैदा एक पकवान बहु, बैठि कबीरा जीम।।4।।
कबीर-एक वस्तु के नाम बहु, लीजै वस्तु पहिचान।
नाम पक्ष नहीं कीजिये, सार तत्व ले जान।।5।।
कबीर-सब काहूका लीजिये, सांचा शब्द निहार।
पक्षपात ना कीजिये, कहै कबीर विचार।।6।।
कबीर-राम कबीरा एक है, दूजा कबहू ना होय।
अंतर टाटी कपट की, तातै दीखे दोय।।7।।
कबीर-राम कबीर एक है, कहन सुनन को दोय।
दो करि सोई जानई, सतगुरु मिला न होय।।8।।
रामानंद जी ने सिकंदर को सीने से लगाया तथा उसके बाद हिन्दू तथा
मुसलमान को तथा सर्व जाति व धर्मों के व्यक्तियों को प्रभु के बच्चे जानकर
प्यार देने लगे तथा अपने औपचारिक शिष्य वास्तव में परमेश्वर कबीर साहेब
जी का धन्यवाद किया कि आपने मेरा अज्ञान पूर्ण रूप से दूर कर दिया। हम
एक पिता प्रभु की संतान हैं, मुझे दृढ़ विश्वास हो गया। दिल्ली के बादशाह
सिकंदर लोधी के साथ उनका धार्मिक गुरु शेखतकी भी बनारस गया था। वह
रैस्ट हाऊस(विश्राम गृह) में ही रूका था। क्योंकि शेखतकी हिन्दू संतों से बहुत
ईर्ष्या करता था तथा उन्हें व उनके शिष्यों को काफिर कहता था। इसलिए
स्वामी रामानन्द जी के आश्रम में जाने से इंकार कर दिया था। राजा सिकंदर
लोधी के साथ स्वामी रामानन्द जी के आश्रम में नहीं गया था।
महाराजा सिकंदर ने विश्राम गृह में आकर परमेश्वर कबीर साहेब जी
द्वारा अपने असाध्य रोग का निवारण केवल आशीर्वाद मात्रा से करने तथा
स्वामी रामानन्द जी को पुनर् जीवित करने की कथा खुशी के साथ अपने
धार्मिक पीर शेखतकी को बताई तथा कहा कि पीर जी मैं पूर्ण रूप से स्वस्थ
हूँ। मेरे किसी अंग में कोई पीड़ा नहीं है। रात्रि का समय था। प्रभु कबीर साहेब
जी सुबह आने की कहकर अपनी कुटिया पर चले गये थे।
शेखतकी ने बादशाह के मुख से अन्य संत की भुरि-भुरि प्रशंसा सुनी तो
अन्दर ही अन्दर जल-भुन गया। रात भर करवटें बदलता रहा। परमेश्वर
कबीर साहेब जी को नीचा दिखाने की योजना बनाता रहा।
जानने के लिए देखिए साधना टीवी शाम7:30से8:30तक