Thursday, June 25, 2020
Wednesday, June 24, 2020
माता पिता आदरणीय हैं।
माता पिता हमारे लिए आदरणीय है
माता-पिता भगवान नहीं।
क्योंकि माता पिता हमें हर जन्म में मिल जाते हैं आप गधे की यौनी मे जाओगे आपको वहां भी माता पिता मिल जावेंगे इसी तरह आप चाहे कुत्ते, सुअर, बिल्ली ,गाय, भेड, बकरी किसी भी यौनी मे चले जाओगे वहां भी आपको माता पिता मिलेंगे इसलिए माता पिता की सेवा करने से केवल सेवा अर्थात् पुण्य बन जावेंगे और उसी भुगतान हमे हर जन्म में करना होता है और इसी कारण हमें बार बार जन्म लेने व मरने का असहनीय दर्द उठाना पडता है कहने का मतलब यह है कि हमें माता पिता की सेवा अवश्य करें पर भगवान मानकर नहीं बल्कि कर्तव्य जानकर करे क्योंकि उनका हमारे को जन्म देने, पालने पोषने ,पढाने लिखाने और स्वयं के पैरों पर खडा करने का बहुत कर्ज हमारे पर चढ जाता है जिसको हमें उनकी सेवा करके ही उतारना होता है अब प्रश्न यह है कि हमें इस कर्ज और आवागमन के चक्कर से कैसे मुक्त हो इसके लिए हमें पुर्ण सतगुरु बनाना होगा जैसा हमारे शास्त्रों में वर्णित है
सतगुरू के लक्षण कहुं, मधुरे बैन विनोद।
चार वेद षट शास्त्र, कह अट्ठारह बोध।।
क्योंकि
मात पिता मिल जावेंगे, लख चौरासी माही।
सतगुरु सेवा बंदगी ,फेर मिलन की नाही।।
इसलिए माता पिता हर जन्म में मिलेंगे परंतु सतगुरू व उसकी सेवा केवल मनुष्य जन्म में ही सम्भव है और बिना सतगुरु के यहा के महान कष्ट आवागमन, जन्म जन्म का कर्ज आदि से केवल सतगुरू ही बचा सकता है अगर हमने सतगुरू की शरण नहीं ली तो शरीर छूटने के बाद बहुत पछतावा होगा कबीर साहेब ने कहा है
कि
आछे दिन पाछे गये, किया न गुरु से हेत।
अब पछतावे क्या करें, जब चिडिया चुग गई खेत।।
माता पिता हमारे लिए आदरणीय है
माता-पिता की सेवा क्यों करनी चाहिए?
माँ-बाप की सेवा अवश्य करने योग्य है। क्योंकि यदि आप सेवा नहीं करोगे, तो आप किस की सेवा पाओगे? आपकी आनेवाली पीढ़ी कैसे सीखेगी कि आप सेवा करने लायक हो? बच्चे सब देखा करते हैं। वे देखेंगे कि हमारे फादर ने कभी उनके बाप की सेवा नहीं की है! फिर संस्कार तो नहीं ही पड़ेंगे न?
इसलिए सतगुरु बडा होता है और आज इस धरती पर सतगुरु केवल संत रामपाल जी महाराज ही है उनकी बताई गई सतभक्ति और मर्यादा का पालन करके इस जन्म मरण के चक्कर से मुक्त हो सकते हैं इसलिए देर न करो भाइयों संत रामपाल जी महाराज को पहचान कर अपना कल्याण करवालो।
जानने के लिए देखिए साधना टीवी शाम7:30से8:30तक
Wednesday, June 17, 2020
श्री कृष्ण जी
यह अवधारणा थी की द्रौपदी की साडी कृष्ण जी ने बढाई थी,यह अर्ध सत्य है| सत्य तो यह है कि उस समय श्री कृष्ण जी रुक्मणी के साथ चौसर खेल रहे थे|ये सारा खेल कबीर भगवान ने किया और भक्ति की लाज रखी द्रौपदी की साडी बढाकर।
जानने के लिए देखिए ईश्वर टीवी शाम8:30से9:30तक
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Wednesday, June 10, 2020
*पवित्र बाइबिल मे परमेश्वर साकार है और नराकार है।*
*परमेश्वर ने छ:दिन में सृष्टि रचकर सातवें दिन तख्त पर जा बैठा*अर्थात् सशरीर है ।
बाइबिल के अनुसार
(उत्पत्ति ग्रन्थ पृष्ठ नं. 2 पर, अ. 1:20 - 2:5 पर)
छटवां दिन:- प्राणी और मनुष्य:
अन्य प्राणियों की रचना करके
26. फिर परमेश्वर ने कहा, हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाऐं, जो सर्व प्राणियों को काबू रखेगा।
27. तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया, नर और नारी करके मनुष्यों की सृष्टी की।
29. प्रभु ने मनुष्यों के खाने के लिए जितने बीज वाले छोटे पेड़ तथा जितने पेड़ों में बीज वाले फल होते हैं वे भोजन के लिए प्रदान किए हैं, माँस खाना नहीं कहा है।
सातवां दिन:- विश्राम का दिन:
परमेश्वर ने छः दिन में सर्व सृष्टी की उत्पत्ति की तथा सातवें दिन विश्राम किया।
पवित्र बाईबल ने सिद्ध कर दिया कि परमात्मा मानव सदृश शरीर में है, जिसने छः दिन में सर्व सृष्टी की रचना की तथा फिर विश्राम किया।
उत्पति विषय में लिखा है कि परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया। इससे सिद्ध है कि प्रभु भी मनुष्य जैसे शरीर युक्त है तथा छः दिन में सृष्टी रचना करके सातवें दिन तख्त पर जा विराजा।
*पवित्र बाइबिल के अनुसार परमात्मा कबीर है।*
» ईसाई धर्म में पूर्ण परमात्मा (बाइबिल के अनुसार) » पवित्र बाइबिल अय्यूब 36: 5 के अनुसार पूर्ण परमात्मा
» ईसाई धर्म में पूर्ण परमात्मा (बाइबिल के अनुसार) » पवित्र बाइबिल अय्यूब 36: 5 के अनुसार पूर्ण परमात्मा
पवित्र बाइबिल अय्यूब 36: 5 के अनुसार पूर्ण परमात्मा
अय्यूब 36:5 (और्थोडौक्स यहूदी बाइबल - OJB)
परमेश्वर कबीर (शक्तिशाली) है, किन्तु वह लोगों से घृणा नहीं करता है।
परमेश्वर कबीर (सामर्थी) है और विवेकपूर्ण है।
बाइबल ने भी स्पष्ट किया है की प्रभु का नाम कबीर है।
अनुवाद कर्ताओ नें कबीर की जगह शक्तिशाली व सामर्थ वाला लिख दिया है। वास्तव में परमात्मा का नाम कबीर है। वेदो में, भगवद गीता में, श्री गुरु ग्रंथ साहिब में और कुरान शरीफ में भी परमात्मा का नाम कबीर है।
*अनेक प्रभुओं का प्रमाण - पवित्र बाईबल*
3:22. फिर यहोवा प्रभु ने (उत्पति अध्याय 3:22 तथा 17:1 तथा 18:1 से 5 तथा 16 से 23 तथा 26.29.32.33 में) कहा मनुष्य भले-बुरे का ज्ञान पाकर हम में से एक के समान हो गया है। इसलिए ऐसा न हो कि यह जीवन के वृक्ष वाला फल भी तोड़ कर खा ले और सदा जीवित रहे।
उत्पति ग्रन्थ के अध्याय 17 श्लोक 1 (17:1) में कहा है कि जब अब्राम निन्यानवे (99) वर्ष का हो गया तब यहोवा ने उसको दर्शन दे कर कहा ‘‘मैं सर्वशक्तिमान हुँ। मेरी उपस्थिति में चल और सिद्ध होता जा’’ फिर उत्पति ग्रन्थ के अध्याय 18 श्लोक 1 से 10 तथा अध्याय 19 श्लोक 1 से 25 में तीन प्रभुओं का प्रमाण है।
उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि आदम जी का प्रभु कह रहा है कि आदम को भले बुरे का ज्ञान होने से हम में से एक के समान हो गया है। इससे सिद्ध हुआ कि ऐसे प्रभु और भी हैं जब कि इसाई धर्म के श्रद्धालु कहते है परमात्मा एक है तथा यह भी प्रमाणित हुआ कि परमात्मा साकार है मनुष्य जैसा है।
उत्पति ग्रन्थ अध्याय 3 के श्लोक 23. व 24. इसलिए प्रभु ने आदम व उसकी पत्नी को अदन के उद्यान से निकाल दिया।
काल प्रभु ने उनको उस वाटिका से निकाल दिया और कहा कि अब तुम्हें यहाँ नहीं रहने दूँगा और तुझे अपना पेट भरने के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ेगा और औरत को श्राप दिया कि तू हमेशा आदमी के पराधीन रहेगी।
{विशेष:- श्री मनु जी के पुत्र इक्ष्वाकु तथा इसी वंश में राजा नाभीराज हुए। राजा नाभीराज के पुत्र श्री ऋषभदेव जी हुए जो पवित्र जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर माने जाते हैं। यही श्री ऋषभदेव जी की पवित्रत्मा बाबा आदम हुए। जैन धर्म के सद्ग्रन्थ ‘‘आओ जैन धर्म को जाने‘‘ पृष्ठ 154 में लिखा है।} आदम व हव्वा के संयोग से दो पुत्र उत्पन्न हुए। एक का नाम काईन तथा दूसरे का नाम हाबिल रखा। काईन खेती करता था। हाबिल भेड़-बकरियाँ चराया करता था। काईन कुछ धुर्त था परन्तु हाबिल ईश्वर पर विश्वास करने वाला था। काईन ने अपनी फसल का कुछ अंश प्रभु को भेंट किया। प्रभु ने अस्वीकार कर दिया। फिर हाबिल ने अपने भेड़ के पहले मेमने को प्रभु को भेंट किया, प्रभु ने स्वीकार किया। {यदि बाबा आदम में प्रभु बोल रहा होता तो कहता कि बेटा हाबिल मैं तेरे से प्रसन्न हूँ। आप ने जो मैमना भेंट किया यह आप की प्रभु के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है। यह आप ही ले जाईये और इसे बेच कर धर्म (भण्डारा) कीजिए और अपनी भेड़ों की ऊन उतार कर रोजी-रोटी चलाईये तथा प्रभु में विश्वास रखिये। यह बाबा आदम के शरीर में प्रेतवत प्रवेश करके कोई प्रेत व पितर बोल रहा था तथा इसी प्रकार पवित्र बाईबल में माँस खाने का प्रावधान पित्तरों ने किसी नबी में बोल कर करवाया है।}
इस से काईन को द्वेष हुआ तथा अपने छोटे भाई को मार दिया। कुछ समय के बाद आदम व हव्वा से एक पुत्र हुआ उसका नाम सेत रखा। सेत को फिर पुत्र हुआ उसका नाम एनोस रखा। उस समय से लोग प्रभु का नाम लेने लगे।
विचार करें - जहाँ से पवित्र ईसाई व मुसलमान धर्म प्रथम पुरूष के वंश की शुरूआत हुई वहीं से मार-काट लोभ और लालच द्वेष परिपूर्ण है। आगे चलकर इसी परंपरा में ईसा मसीह जी का जन्म हुआ। इनकी पूज्य माता जी का नाम मरियम तथा पूज्य पिता जी का नाम यूसुफ था। परन्तु मरियम को गर्भ एक देवता से रहा था। इस पर यूसुफ ने आपत्ति की तथा मरियम को त्यागना चाहा तो स्वपन में (फरिश्ते) देवदूत ने ऐसा न करने को कहा तथा यूसुफ ने डर के मारे मरियम का त्याग न करके उसके साथ पति-पत्नी रूप में रहे। देवता से गर्भवती हुई मरियम ने ईसा को जन्म दिया। हजरत ईसा से पवित्र ईसाई धर्म की स्थापना हुई। ईसा मसीह के नियमों पर चलने वाले भक्त आत्मा ईसाई कहलाए तथा पवित्र ईसाई धर्म का उत्थान हुआ।
प्रमाण के लिए कुरान शरीफ में सूरः मर्यम-19 में तथा पवित्र बाईबल में मती रचित सुसमाचार मती=1:25 पृष्ठ नं. 1-2 पर।
हजरत ईसा जी को भी पूर्ण परमात्मा सत्यलोक से आकर मिले तथा एक परमेश्वर का मार्ग समझाया। इसके बाद ईसा जी एक ईश्वर की भक्ति समझाने लगे। लोगों ने बहुत विरोध किया। फिर भी वे अपने मार्ग से विचलित नहीं हुए। परन्तु बीच-बीच में ब्रह्म(काल/ज्योति निरंजन) के फरिश्ते हजरत ईसा जी को विचलित करते रहे तथा वास्तविक ज्ञान को दूर रखा।
हजरत यीशु का जन्म तथा मृत्यु व जो जो भी चमत्कार किए वे पहले ब्रह्म(ज्योति निरंजन) के द्वारा निर्धारित थे। यह प्रमाण पवित्र बाईबल में है कि एक व्यक्ति जन्म से अंधा था। वह हजरत यीशु मसीह के पास आया। हजरत जी के आशीर्वाद से उस व्यक्ति की आँखें ठीक हो गई। शिष्यों ने पूछा हे मसीह जी इस व्यक्ति ने या इसके माता-पिता ने कौन-सा ऐसा पाप किया था जिस कारण से यह अंधा हुआ तथा माता-पिता को अंधा पुत्र प्राप्त हुआ। यीशु जी ने कहा कि इसका कोई पाप नहीं है जिसके कारण यह अंधा हुआ है तथा न ही इसके माता-पिता का कोई पाप है जिस कारण उन्हें अंधा पुत्र प्राप्त हुआ। यह तो इसलिए हुआ है कि प्रभु की महिमा प्रकट करनी है। भावार्थ यह है कि यदि पाप होता तो हजरत यीशु आँखे ठीक नहीं कर सकते थे। यह सब काल ज्योति निरंजन (ब्रह्म) का सुनियोजित जाल है। जिस कारण उसके द्वारा भेजे अवतारों की महिमा बन जाए तथा आस पास के सभी प्राणी उस पर आसक्त होकर उसके द्वारा बताई ब्रह्म साधना पर अटल हो जाऐं। जब परमेश्वर का संदेशवाहक आए तो कोई भी विश्वास न करे। जैसे हजरत ईसा मसीह के चमत्कारों में लिखा है कि एक प्रेतात्मा से पीडि़त व्यक्ति को ठीक कर दिया। यह काल स्वयं ही किसी प्रेत तथा पित्तर को प्रेरित करके किसी के शरीर में प्रवेश करवा देता है। फिर उसको किसी के माध्यम से अपने भेजे दूत के पास भेजकर प्रेत को भगा देता है। उसके अवतार की महिमा बन जाती है। या कोई साधक पहले का भक्ति युक्त होता है। उससे भी ऐसे चमत्कार उसी की कमाई से करवा देता है तथा उस साधक की महिमा करवा कर हजारों को उसका अनुयाई बनवा कर काल जाल में फंसा देता है तथा उस पूर्व भक्ति कमाई युक्त साधक की कमाई को समाप्त करवा कर नरक में डाल देता है।
इसी तरह का उदाहरण पवित्र बाईबल ‘शमूएल‘ नामक अध्याय 16:14-23 में है कि शाऊल नामक व्यक्ति को एक प्रेत दुःखी करता था। उसके लिए बालक दाऊद को बुलाया जिससे उसको कुछ राहत मिलती थी। क्योंकि हजरत दाऊद भी ज्योति निरंजन का भेजा हुआ पूर्व शक्ति युक्त साधक पूर्व की भक्ति कमाई वाला था। जिसको ‘जबूर‘ नामक किताब ज्योति निरंजन/ब्रह्म ने बड़ा होने पर उतारी।
हजरत ईसा मसीह की मृत्यु 30 वर्ष की आयु में हुई जो पूर्व ही निर्धारित थी। स्वयं ईसा जी ने कहा कि मेरी मृत्यु निकट है तथा तुम (मेरे बारह शिष्यों) में से ही एक मुझे विरोधियों को पकड़वाएगा। उसी रात्री में सर्व शिष्यों सहित ईसा जी एक पर्वत पर चले गए। वहाँ उनका दिल घबराने लगा। अपने शिष्यों से कहा कि आप जागते रहना। मेरा दिल घबरा रहा है। मेरा जी निकला जा रहा है। मुझे सहयोग देना। ऐसा कह कर कुछ दूरी पर जाकर मुंह के बल पृथ्वी पर गिरकर प्रार्थना की (38,39), वापिस चेलों के पास लौटे तो वे सो रहे थे। यीशु ने कहा क्या तुम मेरे साथ एक पल भी नहीं जाग सकते। जागते रहो, प्रार्थना करते रहो, ताकि तुम परीक्षा में फेल न हो जाओ। मेरी आत्मा तो मरने को तैयार है, परन्तु शरीर दुर्बल है। इसी प्रकार यीशु मसीह ने तीन बार कुछ दूर जाकर प्रार्थना की तथा फिर वापिस आए तो सभी शिष्यांे को तीनों बार सोते पाया। ईसा मसीह के प्राण जाने को थे, परन्तु चेले राम मस्ती में सोए पड़े थे। गुरु जी की आपत्ति का कोई गम नहीं।
तीसरी बार भी सोए पाया तब कहा मेरा समय आ गया है, तुम अब भी सोए पड़े हो। इतने में तलवार तथा लाठी लेकर बहुत बड़ी भीड़ आई तथा उनके साथ एक ईसा मसीह का खास यहूंदा इकसरौती नामक शिष्य था, जिसने तीस रूपये के लालच में अपने गुरु जी को विरोधियों के हवाले कर दिया।(मत्ती 26:24-55 पृष्ठ 42-44)
उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि पुण्यात्मा ईसा मसीह जी को केवल अपना पूर्व का निर्धारित जीवन काल प्राप्त हुआ जो उनके विषय में पहले ही पूर्व धर्म शास्त्रों में लिखा था। "मत्ती रचित समाचार" पष्ठ 1 पर लिखा है कि याकुब का पुत्र युसूफ था। युसूफ ही मरियम का पति था। मरियम को एक फरिश्ते से गर्भ रहा था। तब हजरत ईसा जी का जन्म हुआ समाज की दृष्टि में ईसा जी के पिता युसूफ थे। (मत्ती 1:1-18)
तीस (30) वर्ष की आयु में ईसा मसीह जी को शुक्रवार के दिन सलीब मौत (दीवार) के साथ एक आकार के लकड़ के ऊपर ईसा को खड़ा करके हाथों व पैरों में मेख (मोटी कील) गाड़ दी। जिस कारण अति पीड़ा से ईसा जी की मृत्यु हुई। तीसरे दिन रविवार को ईसा जी फिर से दिखाई देने लगे। 40 दिन (चालीस) कई जगह अपने शिष्यों को दिखाई दिए। जिस कारण भक्तों में परमात्मा के प्रति आस्था दृढ़ हुई। वास्तव में पूर्ण परमात्मा ने ही ईसा जी के रूप में प्रकट होकर प्रभु भक्ति को जीवित रखा था। काल तो चाहता है यह संसार नास्तिक हो जाए। परन्तु पूर्ण परमात्मा ने यह भक्ति वर्तमान समय तक जीवित रखनी थी। अब यह पूर्ण रूप से फैलेगी। उस समय के शासक(गवर्नर) पिलातुस को पता था कि ईसा जी निर्दोष हैं परन्तु फरीसियों अर्थात् मूसा के अनुयाईयों के दबाव में आकर सजा सुना दी थी।
*पवित्र बाइबिल मे माँस खाना परमेश्वर का आदेश नहीं।*
» ईसाई धर्म में पूर्ण परमात्मा (बाइबिल के अनुसार) » भगवान ने मनुष्य को शाकाहारी भोजन खाने के आदेश दिये हैं - पवित्र बाइबल
भगवान ने मनुष्य को शाकाहारी भोजन खाने के आदेश दिये हैं - पवित्र बाइबल
पवित्र बाइबल - उत्पत्ति
1:29 - फिर परमेश्वर ने उन से कहा, सुनो, जितने बीज वाले छोटे छोटे पेड़ सारी पृथ्वी के ऊपर हैं और जितने वृक्षों में बीज वाले फल होते हैं, वे सब मैं ने तुम को दिए हैं; वे तुम्हारे भोजन के लिये हैं:
1:30 - और जितने पृथ्वी के पशु, और आकाश के पक्षी, और पृथ्वी पर रेंगने वाले जन्तु हैं, जिन में जीवन के प्राण हैं, उन सब के खाने के लिये मैं ने सब हरे हरे छोटे पेड़ दिए हैं; और वैसा ही हो गया।
आज सर्व भक्त समाज धर्म गुरू समाज सेवी संस्थाएं शास्त्राविधि को छोड़ कर मनमानी पूजा अर्चना करा
रहे है यानि अज्ञान के कारण शास्त्र विरूद्ध साधना से भक्ति करने वाले का अनमोल मानव (स्त्री-पुरूष का) जीवन नष्ट हो रहा है जो साधक शास्त्राविधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है यानि किसी को देखकर या किसी के कहने से भक्ति साधना करता है तो उसको न तो कोई सुख प्राप्त होता है, न कोई सिद्धि यानि भक्ति की शक्ति प्राप्त होती है, न उसकी गति होती है। इन्हीं तीन लाभों के लिए साधक साधना करता है जिस कारण से समाज नास्तिक होता जा रहा हैं ।आज शास्त्र अनुकूल साधना केवल संत रामपाल जी महाराज के पास ही है। आप से विनती है
कि उनसे दीक्षा लेकर अपना व परिवार का कल्याण करवाए व शास्त्र विपरीत साधना कर रहे हो, उसे तुरंत त्याग दो।
Sunday, June 7, 2020
जो परमात्मा को दो समझते हैं वो अज्ञानी है।
अति आधीन दीन हो प्राणी, ताते कहिए ये अकथ कहानी।‘‘
उच्चे पात्र जल ना जाई, ताते नीचा हुजै भाई।
आधीनी के पास हैं पूर्ण ब्रह्म दयाल।
मान बड़ाई मारिए बे अदबी सिर काल।।
कबीर परमेश्वर ने यहाँ पर एक तीर से दो शिकार किए। स्वामी रामानंद
जी में धर्म भेद-भाव की भावना शेष थी, वह भी निकालनी थी। रामानंद जी
मुसलमानां को हिन्दूओं से अभी भी भिन्न तथा हेय मानते थे। सिकंदर में
अहंकार की भावना थी। यदि वह नम्र नहीं होता तो कबीर साहेब कृपा नहीं
करते तथा सिकंदर स्वस्थ नहीं होता} बीर सिंह को देखकर तथा डरते हुए
सिकंदर लौधी ने भी दण्डवत् प्रणाम किया। कबीर परमेश्वर जी ने दोनों के
सिर पर हाथ रखा और कहा कि दो-2 नरेश आज मुझ गरीब के पास कैसे
आए हैं? मुझ गरीब को कैसे दर्शन दिए? परमेश्वर कबीर जी ने अपना हाथ
उठाया भी नहीं था कि सिकंदर का जलन का रोग समाप्त हो गया। सिकंदर
लौधी की आँखों में पानी आ गया। (संत के सामने यह मन भाग जाता है और
ये आत्मा ऊपर आ जाती है क्योंकि परमात्मा आत्मा का साथी है। ‘‘अन्तरयामी
एक तू आत्म के आधार।‘‘ आत्मा का आधार कबीर भगवान है।) सिकंदर
लौधी ने पैर पकड़ कर छोड़े नहीं और रोता ही रहा। परमेश्वर जानी जान
होते हुए भी कबीर साहेब ने सिकन्दर लोधी दिल्ली के बादशाह से पूछा क्या
बात है?। सिकंदर ने कहा कि दाता मैंने घोर अपराध कर दिया। आप मुझे
क्षमा नहीं कर सकते। जिस काम के लिए मैं आया था वह असाध्य रोग तो
आपके स्पर्श मात्र से ठीक हो गया। इस पापी को क्षमा कर दो। कबीर साहेब
ने कहा क्षमा कर दिया। यह तो बता कि क्या हुआ? सिकंदर ने कहा कि आप
क्षमा कर नहीं सकते। मैंने ऐसा पाप किया है। कबीर साहेब ने कहा कि क्षमा
कर दिया। सिकंदर ने फिर कहा कि सच में माफ कर दिया? कबीर साहेब
ने कहा कि हाँ क्षमा कर दिया। अब बता क्या कष्ट है? सिकंदर ने कहा कि
दाता मुझ पापी ने गुस्से में आकर आपके गुरुदेव का सिर कलम कर दिया
और फिर सारी कहानी बताई। कबीर साहेब बोले कोई बात नहीं। जो हुआ
प्रभु इच्छा से ही हुआ है आप स्वामी रामानन्द जी का अन्तिम संस्कार करवा
कर जाना नहीं तो आप निंदा के पात्रा बनोगे। परमेश्वर कबीर साहेब जी
नाराज नहीं हुए। सिकंदर लोधी ने बीर सिंह के मुख की और देखा और कहा
कि बीर सिंह यह तो वास्तव में भगवान है। देखिए मैंने गुरुदेव का सिर काट
दिया और कबीर जी को क्रोध भी नहीं आया। बीर सिंह चुप रहा और
साथ-साथ हो लिया और मन ही मन में सोचता है कि अभी क्या है, अभी तो
और देखना। यह तो शुरूआत है।
स्वामी रामानन्द जी को जीवित करना”
परमेश्वर कबीर जी ने अन्दर जाकर देखा रामानंद जी का धड़ कहीं पर
और सिर कहीं पर पड़ा था। शरीर पर चादर डाल रखी थी। कबीर साहेब ने
अपने गुरुदेव के मृत शरीर को दण्डवत् प्रणाम किया और चरण छुए तथा
कहा कि गुरुदेव उठो। दिल्ली के बादशाह आपके दर्शनार्थ आए हैं। एक बार
उठना। दूसरी बार ही कहा था, सिर अपने आप उठकर धड़ पर लग गया
सर्व मनुष्य एक प्रभु के बच्चे हैं, जो दो मानता है
वह अज्ञानी है”
रामानंद जी के शरीर से आधा खून और आधा दूध निकला हुआ था। जब
साहेब कबीर से स्वामी रामानन्द जी ने कारण पूछा तो साहेब ने बताया कि
स्वामी जी आपके अन्दर यह थोड़ी-सी कसर और रह रही है कि अभी तक
आप हिन्दू और मुसलमान को दो समझते हो। इसलिए आधा खून और आधा
दूध निकला है। आप अन्य जाति वालों को अपना साथी समझ चुके हो। यह
जीव सभी एक हैं। आप तो जानीजान हो। आप तो लीला कर रहे हो अर्थात्
उसको गोल-मोल भी कर दिया और समझा भी गए।
कबीर-अलख इलाही एक है, नाम धराया दोय।
कहै कबीर दो नाम सुनि, भरम परो मति कोय।।1।।
कबीर-राम रहीमा एक है, नाम धराया दोय।
कहै कबीर दो नाम सुनि, भरम परो मति कोय।।2।।
कबीर-कृष्ण करीमा एक है, नाम धराया दोय।
कहै कबीर दो नाम सुनि, भरम परो मति कोय।।3।।
कबीर-काशी काबा एक है, एकै राम रहीम।
मैदा एक पकवान बहु, बैठि कबीरा जीम।।4।।
कबीर-एक वस्तु के नाम बहु, लीजै वस्तु पहिचान।
नाम पक्ष नहीं कीजिये, सार तत्व ले जान।।5।।
कबीर-सब काहूका लीजिये, सांचा शब्द निहार।
पक्षपात ना कीजिये, कहै कबीर विचार।।6।।
कबीर-राम कबीरा एक है, दूजा कबहू ना होय।
अंतर टाटी कपट की, तातै दीखे दोय।।7।।
कबीर-राम कबीर एक है, कहन सुनन को दोय।
दो करि सोई जानई, सतगुरु मिला न होय।।8।।
रामानंद जी ने सिकंदर को सीने से लगाया तथा उसके बाद हिन्दू तथा
मुसलमान को तथा सर्व जाति व धर्मों के व्यक्तियों को प्रभु के बच्चे जानकर
प्यार देने लगे तथा अपने औपचारिक शिष्य वास्तव में परमेश्वर कबीर साहेब
जी का धन्यवाद किया कि आपने मेरा अज्ञान पूर्ण रूप से दूर कर दिया। हम
एक पिता प्रभु की संतान हैं, मुझे दृढ़ विश्वास हो गया। दिल्ली के बादशाह
सिकंदर लोधी के साथ उनका धार्मिक गुरु शेखतकी भी बनारस गया था। वह
रैस्ट हाऊस(विश्राम गृह) में ही रूका था। क्योंकि शेखतकी हिन्दू संतों से बहुत
ईर्ष्या करता था तथा उन्हें व उनके शिष्यों को काफिर कहता था। इसलिए
स्वामी रामानन्द जी के आश्रम में जाने से इंकार कर दिया था। राजा सिकंदर
लोधी के साथ स्वामी रामानन्द जी के आश्रम में नहीं गया था।
महाराजा सिकंदर ने विश्राम गृह में आकर परमेश्वर कबीर साहेब जी
द्वारा अपने असाध्य रोग का निवारण केवल आशीर्वाद मात्रा से करने तथा
स्वामी रामानन्द जी को पुनर् जीवित करने की कथा खुशी के साथ अपने
धार्मिक पीर शेखतकी को बताई तथा कहा कि पीर जी मैं पूर्ण रूप से स्वस्थ
हूँ। मेरे किसी अंग में कोई पीड़ा नहीं है। रात्रि का समय था। प्रभु कबीर साहेब
जी सुबह आने की कहकर अपनी कुटिया पर चले गये थे।
शेखतकी ने बादशाह के मुख से अन्य संत की भुरि-भुरि प्रशंसा सुनी तो
अन्दर ही अन्दर जल-भुन गया। रात भर करवटें बदलता रहा। परमेश्वर
कबीर साहेब जी को नीचा दिखाने की योजना बनाता रहा।
जानने के लिए देखिए साधना टीवी शाम7:30से8:30तक
Thursday, June 4, 2020
कबीर परमेश्वर जी का कलयुग में अवतरण’’
कबीर परमेश्वर जी का कलयुग में अवतरण’’
परमेश्वर कबीर जी के विषय में दन्त कथा प्रचलित है कि उनका जन्म
विधवा स्त्री के गर्भ से महर्षि रामानन्द जी के आशीर्वाद से हुआ था। यह पूर्णतया
निराधार है। कृपया पढि़ए कबीर देव जी का यथार्थ संक्षिप्त परिचय।
बन्दी छोड़ कबीर परमेश्वर जी ने द्वापर युग में अपने प्रिय शिष्य सुदर्शन
बाल्मीकि जी को शरण में लिया था। उस समय कबीर जी नामान्तर करके
करूणामय नाम से लीला कर रहे थे। भक्त सुदर्शन जी के माता-पिता ने
परमेश्वर कबीर जी के ज्ञान को स्वीकार नहीं किया था जिनके नाम थे पिता जी
का नाम ‘‘भीखू राम’’ तथा माता जी का नाम ‘‘सुखवन्ती’’। जिस समय दोनों
(माता तथा पिता) शरीर त्याग गए तो भक्त सुदर्शन जी अत्यन्त व्याकुल रहने
लगे। भक्ति भी कम करते थे। अर्न्तयामी करूणामय जी (द्वापर युग में कबीर
परमेश्वर करूणामय नाम से लीला कर रहे थे) ने अपने भक्त के मन की बात
जान कर पूछा हे भक्त सुदर्शन! आप को कौन सी चिन्ता सता रही है। क्या
माता-पिता का वियोग सता रहा है? या कोई अन्य पारिवारिक परेशानी है? मुझे
बताईए।
भक्त सुदर्शन जी ने कहा हे बन्दी छोड़! हे अन्तर्यामी! आप सर्वज्ञ हैं आप
बाहर-भीतर की सर्व स्थिति से परिचित है। हे प्रभु! मुझे मेरे माता-पिता के निधन
का दुःख नहीं है क्योंकि वे बहुत वृद्ध हो चुके थे। आप ने बताया है कि यह पाँच
तत्व का पूतला एक दिन नष्ट होना है। मुझे चिन्ता सता रही है कि मेरे
माता-पिता अत्यन्त पुण्यात्मा, दयालु तथा धर्मात्मा थे। उन्होंने अपनी भक्ति
लोकवेद अनुसार की थी। जो शास्त्रविधि के विरूद्ध थी। जिस कारण से उनका
मानव जीवन व्यर्थ गया। अब पता नहीं किस प्राणी की योनी में कष्ट उठा रहे
होंगे? आपका दास आप से नम्र निवेदन करता है कि कभी मेरे माता-पिता मानव
शरीर प्राप्त करें तो उन्हें अपनी शरण में लेना परमेश्वर तथा उन्हें भी भवसागर
से (काल ब्रह्म के लोक से) पार करना मेरे दाता ! मुझे यही चिन्ता सता रही है।
परमेश्वर कबीर जी ने सोचा कि यह भोला भक्त सुदर्शन माता-पिता के मोह में
फंस कर काल जाल में ही रहेगा। काल ब्रह्म ने मोह रूपी पाश बहुत दृढ़ बना
रखा है। यह विचार कर परमेश्वर कबीर जी ने कहा हे भक्त सुदर्शन ! आप
चिन्ता मत करो मैं आप के माता-पिता को अवश्य शरण में लूंगा तथा पार करके
ही दम लूंगा। आप सत्य लोक जाओ। यह चिन्ता छोड़ो। परमेश्वर कबीर जी के
आश्वासन के पश्चात् भक्त सुदर्शन जी सत्य साधना करके सत्यलोक को गया। पूर्ण मोक्ष प्राप्त किया।
भक्त सुदर्शन बाल्मीकि के माता-पिता वाले जीवों ने कलयुग में मानव
शरीर प्राप्त हुआ। भारत वर्ष के काशी शहर में सुदर्शन के पिता वाले जीव ने एक
ब्राह्मण के घर जन्म लिया तथा गौरीशंकर नाम रखा गया तथा सुदर्शन जी की
माता वाले जीव ने भी एक ब्राह्मण के घर कन्या रूप में जन्म लिया तथा सरस्वती
नाम रखा। युवा होने पर दोनों का विवाह हुआ। गौरी शंकर ब्राह्मण भगवान शिव
का उपासक था तथा शिव पुराण की कथा करके भगवान शिव की महिमा का
गुणगान किया करता। गौरीशंकर निर्लोभी था। कथा करने से जो धन प्राप्त होता
था उसे धर्म में ही लगाया करता था। जो व्यक्ति कथा कराते थे तथा सुनते थे
सर्व गौरी शंकर ब्राह्मण के त्याग की प्रसंशा करते थे।
जिस कारण से पूरी काशी में गौरी शंकर की प्रसिद्धी हो रही थी। अन्य
स्वार्थी ब्राह्मणों का कथा करके धन इकत्रित करने का धंधा बन्द हो गया। इस
कारण से वे ब्राह्मण उस गौरीशंकर ब्राह्मण से ईर्ष्या रखते थे। इस बात का पता
मुसलमानों को लगा कि एक गौरीशंकर ब्राह्मण काशी में हिन्दुधर्म के प्रचार को
जोर-शोर से कर रहा है। इसको किस तरह बन्द करें। मुसलमानों को पता चला
कि काशी के सर्व ब्राह्मण गौरीशंकर से ईर्ष्या रखते हैं। इस बात का लाभ
मुसलमानों ने उठाया। गौरीशंकर व सरस्वती के घर के अन्दर अपना पानी
छिड़क दिया। अपना झूठा पानी उनके मुख पर लगा दिया। कपड़ों पर भी
छिड़क दिया तथा आवाज लगा दी कि गौरीशंकर तथा सरस्वती मुसलमान बन
गए हैं। पुरूष का नाम नूरअली उर्फ नीरू तथा स्त्री का नाम नियामत उर्फ नीमा
रखा। अन्य स्वार्थी ब्राह्मणों को पता चला तो उनका दाँव लग गया। उन्होंने
तुरन्त ही ब्राह्मणों की पंचायत बुलाई तथा फैसला कर दिया कि गौरीशंकर तथा
सरस्वती मुसलमान बन गए हैं अब इनका ब्राह्मण समाज से कोई नाता नहीं रहा
है। इनका गंगा में स्नान करने, मन्दिर में जाने तथा हिन्दु ग्रन्थों को पढ़ने पर
प्रतिबन्ध लगा दिया गया है।
गौरीशंकर (नीरू) जी कुछ दिन तो बहुत परेशान रहे। जो कथा करके धन
आता था उसी से घर का निर्वाह चलता था। उसके बन्द होने से रोटी के भी लाले
पड़ गए। नीरू ने विचार करके अपने निर्वाह के लिए कपड़ा बुनने का कार्य
प्रारम्भ किया। जिस कारण से जुलाहा कहलाया। कपड़ा बुनने से जो मजदूरी
मिलती थी उसे अपना तथा अपनी पत्नी का पेट पालता था। जिस समय धन
अधिक आ जाता तो उसको धर्म में लगा देता था। विवाह को कई वर्ष बीत गए
थे। उनको कोई सन्तान नहीं हुई। दोनों पति-पत्नी ने बच्चे होने के लिए बहुत
अनुष्ठान किए। साधु सन्तों का आशीर्वाद भी लिया परन्तु कोई सन्तान नहीं हुई।
हिन्दुओं द्वारा उन दोनों का गंगा नदी में स्नान करना बन्द कर दिया गया था। उनके निवास स्थान से लगभग चार कि.मी. दूर एक लहर तारा नामक सरोवर
था जिस में गंगा नदी का ही जल लहरों के द्वारा नीची पटरी के ऊपर से उछल
कर आता था। इसलिए उस सरोवर का नाम लहरतारा पड़ा। उस तालाब में
बड़े-2 कमल के फूल उगे हुए थे। मुसलमानों ने गौरीशंकर का नाम नूर अल्ली
रखा जो उर्फ नाम से नीरू कहलाया तथा पत्नी का नाम नियामत रखा जो उर्फ
नाम से नीमा कहलाई। नीरू-नीमा भले ही मुसलमान बन गए थे परन्तु अपने
हृदय से साधना भगवान शंकर जी की ही करते थे तथा प्रतिदिन सवेरे सूर्योदय
से पूर्व लहरतारा तालाब में स्नान करने जाते थे।
ज्येष्ठ मास की शुक्ल पूर्णमासी विक्रमी संवत् 1455 (सन् 1398) सोमवार
को भी ब्रह्म मुहूर्त (ब्रह्म महूर्त का समय सूर्योदय से लगभग डेढ़ घण्टा पहले होता
है) में स्नान करने के लिए जा रहे थे। नीमा रास्ते में भगवान शंकर से प्रार्थना
कर रही थी कि हे दीनानाथ! आप अपने दासों को भी एक बच्चा-बालक दे दो
आप के घर में क्या कमी है प्रभु! हमारा भी जीवन सफल हो जाएगा। दुनिया के
व्यंग्य सुन-2 कर आत्मा दुःखी हो जाती है। मुझ पापिनी से ऐसी कौन सी गलती
किस जन्म में हुई है जिस कारण मुझे बच्चे का मुख देखने को तरसना पड़ रहा
है। हमारे पापों को क्षमा करो प्रभु! हमें भी एक बालक दे दो।
यह कह कर नीमा फूट-2 कर रोने लगी तब नीरू ने धैर्य दिलाते हुए कहा हे
नीमा! हमारे भाग्य में सन्तान नहीं है यदि भाग्य में सन्तान होती तो प्रभु शिव
अवश्य प्रदान कर देते। आप रो-2 कर आँखे खराब कर लोगी। बालक भाग्य में
है नहीं जो वृद्ध अवस्था में उंगली पकड़ लेता। आप मत रोओ आप का बार-2
रोना मेरे से देखा नहीं जाता। यह कह कर नीरू की आँखे भी भर आई। इसी
तरह प्रभु की चर्चा व बालक प्राप्ति की याचना करते हुए उसी लहरतारा तालाब
पर पहुँच गए। प्रथम नीमा ने प्रवेश किया, पश्चात् नीरू ने स्नान करने को
तालाब में प्रवेश किया। सुबह का अंधेरा शीघ्र ही उजाले में बदल जाता है। जिस
समय नीमा ने स्नान किया था उस समय तक तो अंधेरा था। जब कपड़े बदल
कर पुनः तालाब पर उस कपड़े को धोने के लिए गई, जिसे पहन कर स्नान
किया था, उस समय नीरू तालाब में प्रवेश करके गोते लगा-2 कर मल मल
कर स्नान कर रहा था।
नीमा की दृष्टि एक कमल के फूल पर पड़ी जिस पर कोई वस्तु हिल रही
थी। प्रथम नीमा ने जाना कोई सर्प है जो कमल के फूल पर बैठा अपने फन को
उठा कर हिला रहा है। उसने सोचा कहीं यह सर्प मेरे पति को न डस ले नीमा ने
उसको ध्यानपूर्वक देखा वह सर्प नहीं है कोई बालक था। जिसने एक पैर अपने
मुख में ले रखा था तथा दूसरे को हिला रहा था नीमा ने अपने पति से ऊँची आवाज में कहा देखियो जी! एक छोटा बच्चा
कमल के फूल पर लेटा है। वह जल में डूब न जाए। नीरू स्नान करते-2 उस की
ओर न देख कर बोला नीमा! बच्चों की चाह ने तूझे पागल बना दिया है। अब
तूझे जल में भी बच्चे दिखाई देने लगे हैं। नीमा ने अधिक तेज आवाज में कहा मैं
सच कह रही हूँ, देखो सचमुच एक बच्चा कमल के फूल पर, वह रहा, देखो!
देखो--- नीमा की आवाज में परिवर्तन व अधिक कसक देखकर नीरू ने उस
ओर देखा जिस ओर नीमा हाथ से संकेत कर रही थी। कमल के फूल पर
नवजात शिशु को देखकर नीरू ने आव देखा न ताव झपट कर कमल के फूल
सहित बच्चा उठाकर अपनी पत्नी को दे दिया।
नीमा ने परमेश्वर कबीर जी को सीने से लगाया, मुख चूमा, पुत्रवत् प्यार
किया जिस परमेश्वर की खोज में ऋषि-मुनियों ने जीवन भर शास्त्रविधि विरूद्ध
साधना की उन्हें नहीं मिला। वही परमेश्वर भक्तमति नीमा की गोद में खेल रहा
था। जिस शान्तिदायक परमेश्वर को आन्नद की प्राप्ति के लिए प्राप्त करने
की इच्छा से साधना की जाती है वही परमेश्वर नीमा के हाथों में सीने से लगा
हुआ था। उस समय जो शीतलता व आनन्द का अनुभव भक्तमति नीमा को हो रहा
होगा उस की कल्पना ही की जा सकती है। नीरू स्नान करके जल से बाहर
आया। नीरू ने सोचा यदि हम इस बच्चे को नगर में ले जाऐंगे तो शहर वासी हम
पर शक करेंगे सोचेंगे कि ये किसी के बच्चे को चुरा कर लाए हैं। कहीं हमें नगर
से निकाल दें। इस डर से नीरू ने अपनी पत्नी से कहा नीमा! इस बच्चे को यहीं
छोड़ दे इसी में अपना हित है। नीमा बोली हे पति देव! यह भगवान शंकर का
दिया खिलौना है। इस बच्चे ने पता नहीं मुझ पर क्या जादू कर दिया है कि मेरा
मन इस बच्चे के वश हो गया है। मैं इस बच्चे को नहीं त्याग सकती। नीरू ने
नीमा को अपने मन की बात से अवगत कराया। बताया कि यह बच्चा नगर
वासी हम से छीन लेगें, पूछेंगे कहाँ से लाए हो? हम कहेंगे लहरतारा तालाब में
कमल के फूल पर मिला है। हमारी बात पर कोई भी विश्वास नहीं करेगा। हो
सकता है वे हमें नगर से भी निकाल दें। तब नीमा ने कहा मैं इस बालक के साथ
देश निकाला भी स्वीकार कर लूंगी। परन्तु इस बच्चे को नहीं त्याग सकती। मैं
अपनी मृत्यु को भी स्वीकार कर लूंगी। परन्तु इस बच्चे से भिन्न नहीं रह सकूंगी।
नीमा का हठ देख कर नीरू को क्रोध आ गया तथा अपने हाथ को थप्पड़ मारने की स्थिति में उठा कर आँखों में आंसू भर कर करूणाभरी आवाज में बोला
नीमा मैंने आज तक तेरी किसी भी बात को नहीं ठुकराया। यह जान कर कि
हमारे कोई बच्चा नहीं है मैंने तुझे पति तथा पिता दोनों का प्यार दिया है। तू मेरे
नम्र स्वभाव का अनुचित लाभ उठा रही है। आज मेरी स्थिति को न समझ कर
अपने हठी स्वभाव से मुझे कष्ट दे रही है। विवाहित जीवन में नीरू ने प्रथम बार
अपनी पत्नी की औेर थप्पड़ मारने के लिए हाथ उठाया था तथा कहा कि या तो
इस बच्चे को यहीं रख दे वरना आज मैं तेरी बहुत पिटाई करूंगा।
उसी समय नीमा के सीने से चिपके बालक रूपधारी परमेश्वर बोले हे
नीरू! आप मुझे अपने घर ले चलो आप पर कोई आपत्ति नहीं आएगी। मैं
सतलोक से चलकर तुम्हारे हित के लिए यहाँ आया हूँ। नवजात शिशु के मुख से
उपरोक्त वचन सुनकर नीरू (नूर अल्ली) डर गया कहीं यह कोई देव या पितर
या कोई सिद्ध पुरूष न हो और मुझे शाप न दे दे। इस डर से नीरू कुछ नहीं
बोला घर की ओर चल पड़ा। पीछे-2 उसकी पत्नी परमेश्वर को प्यार करती हुई
चल पड़ी।
उपरोक्त घटना का प्रत्यक्ष दृष्टा :-
प्रतिदिन की तरह ज्येष्ठ मास की पूर्णमासी विक्रमी संवत् 1455 (1398 ई.)
सोमवार को भी एक अष्टानन्द नामक ऋषि, जो स्वामी रामानन्द ऋषि जी के
शिष्य थे काशी शहर से बाहर बने लहरतारा तालाब के स्वच्छ जल में स्नान
करने के लिए प्रतिदिन की तरह गए। ब्रह्म महूर्त का समय था (ब्रह्म मुहूर्त का
समय सूर्योदय से लगभग डेढ़ घण्टा पूर्व का होता है) ऋषि अष्टानन्द जी ने
लहरतारा तालाब में स्नान किया। वे प्रतिदिन वहीं बैठ कर कुछ समय अपनी
पाठ पूजा किया करते थे। ऋषि अष्टानन्द जी ध्यान मग्न होने की चेष्टा कर ही
रहे थे उसी समय उन्होंने देखा कि आकाश से एक प्रकाश पुंज नीचे की ओर
आता दिखाई दिया। वह इतना तेज प्रकाश था उसे ऋषि जी की चर्म दृष्टि सहन
नहीं कर सकी। जिस प्रकार आँखे सूर्य की रोशनी को सहन नहीं कर पाती। सूर्य
के प्रकाश को देखने के पश्चात् आँखे बन्द करने पर सूर्य का आकार दिखाई
देता है उसमें प्रकाश अधिक नहीं होता।
इसी प्रकार प्रथम बार परमेश्वर के प्रकाश को देखने से ऋषि जी की आँखे
बन्द हो गई बन्द आँखों में शिशु को देख कर फिर से आँखे खोली। ऋषि
अष्टानन्द जी ने देखा कि वह प्रकाश लहरतारा तालाब पर उतर गया। जिससे
पूरा सरोवर प्रकाश मान हो गया तथा देखते ही देखते वह प्रकाश जलास्य के
एक कोने में सिमट गया। ऋषि अष्टानन्द जी ने सोचा यह कैसा दृश्य मैंने देखा।
यह मेरी भक्ति की उपलब्धि है या मेरा दृष्टिदोष है। इस के विषय में गुरूदेव,
स्वामी रामानन्द जी से पूछूंगा। यह विचार करके ऋषि अष्टानन्द जी अपनी शेष साधना को छोड़ कर अपने पूज्य गुरूदेव के पास गए। स्वामी रामानन्द जी को
सर्व घटनाक्रम बताकर पूछा हे गुरूदेव! यह मेरी भक्ति की उपलब्धि है या मेरी
भ्रमणा है। मैंने प्रकाश आकाश से नीचे की ओर आते देखा जिसे मेरी आँखे सहन
नहीं कर सकी। आँखे बन्द हुई तो नवजात शिशु दिखाई दिया। पुनः आँखें
खोली तो उस प्रकाश से पूरा जलास्य ही जगमगा गया, पश्चात् वह प्रकाश उस
तालाब के एक कोने में सिमट गया। मैं आप से कारण जानने की इच्छा से
अपनी साधना बीच में ही छोड़ कर आया हूँ। कृप्या मेरी शंका का समाधान
कीजिए।
ऋषि रामानन्द स्वामी जी ने अपने शिष्य अष्टानन्द से कहा हे ब्राह्मण! यह
न तो तेरी भक्ति की उपलब्धि है न आप का दृष्टिदोष ही है। इस प्रकार की
घटनाऐं उस समय होती हैं। जिस समय ऊपर के लोकों से कोई देव पृथ्वी पर
अवतार धारण करने के लिए आते हैं। वह किसी स्त्री के गर्भ में निवास करता है।
फिर बालक रूप धारण करके नर लीला करके अपना अपेक्षित कार्य पूर्ण करता
है। कोई देव ऊपर के लोकों से आया है। वह काशी नगर में किसी के घर जन्म
लेकर अपना प्रारब्ध पूरा करेगा। उपरोक्त वचनों द्वारा ऋषि रामानन्द स्वामी
जी ने अपने शिष्य अष्टानन्द की शंका का समाधान किया। उन ऋषियों की यही
धारणा थी की सर्व अवतार गण माता के गर्भ से ही जन्म लेते हैं।
बालक को लेकर नीरू तथा नीमा अपने घर जुलाहा मौहल्ला (कालोनी) में
आए। जिस भी नर व नारी ने नवजात शिशु रूप में परमेश्वर कबीर जी को देखा
वह देखता ही रह गया। परमेश्वर का शरीर अति सुन्दर था। आँख जैसे कमल
का फूल हो, घुंघराले बाल, लम्बे हाथ। लम्बी-2 अंगुलियाँ शरीर से मानो नूर
झलक रहा हो। जैसे अंग्रेज गोरे होते हैं इनसे भी अधिक गोरा शरीर परमेश्वर
का था। अग्रेंज सफेद होते हैं परमेश्वर कबीर जी का उन से भी अधिक सफेद
वर्ण का शरीर था। पूरी काशी नगरी में ऐसा अद्धभुत बालक नहीं था। जो भी
देखता वहीं अन्य को बताता कि नूर अली को एक बालक तालाब पर मिला है
आज ही उत्पन्न हुआ शिशु है। डर के मारे लोक लाज के कारण किसी विधवा ने
डाला होगा। बालक को देखने के पश्चात् उसके चेहरे से दृष्टि हटाने को दिल
नहीं करता, आत्मा अपने आप खिंची जाती है। पता नहीं कैसा जादू है बालक के
मुख में? पूरी काशी परमेश्वर के बालक रूप को देखने को उमड़ पड़ी।
स्त्री-पुरूष झुण्ड के झुण्ड बना कर मंगल गान गाते हुए, नीरू के घर बच्चे को
देखने को आए।
बच्चे (कबीर परमेश्वर) को देखकर कोई कह रहा था, यह बालक तो कोई
देवता का अवतार है, कोई कह रहा था। यह तो साक्षात् विष्णु जी ही आए लगते
हैं। कोई कह रहा था यह भगवान शिव ही अपनी काशी नगरी को कृतार्थ करने को उत्पन्न हुए हैं। कोई कह रहा था। यह तो किन्नर का अवतार है, कोई कह
रहा था। यह पितर नगरी से आया है। यह सर्व वार्ता सुनकर नीमा अप्रसन्न हो
कर कहती थी कि मेरे बच्चे के विषय में कुछ मत कहो। हे अल्लाह! मेरे बच्चे की
इनकी नजर से रक्षा करना। तुमने कभी बच्चा देखा भी है कि नहीं। ऐसे समूह के
समूह मेरे बालक को देखने आ रहे हो। आने वाले स्त्री-पुरूष बोले हे नीमा।
हमने बालक तो बहुत देखे हैं परन्तु आप के बालक जैसा नहीं देखा। इसीलिए
हम इसे देखने आए हैं। ऊपर अपने-2 लोकों से श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा
श्री शिवजी भी झांक कर देखने लगे। काशी के वासियों के मुख से अपने में से
(श्री ब्रह्मा, श्री विष्णु तथा शिव में से) एक यह बालक होने की बात सुनकर बोले
कि यह बालक तो किसी अन्य लोक से आया है। इस के मूल स्थान से हम भी
अपरिचित हैं परन्तु है बहुत शक्ति युक्त कोई सिद्ध पुरूष होगा।
पूर्ण परमात्मा माँ के गर्भ से जन्म नहीं लेता।
जानने के लिए देखिए ईश्वर टीवी शाम8:30से9:30तक
Wednesday, June 3, 2020
5 June कबीर प्रकट दिवस ,सृष्टि रचना
पवित्र श्रीमद्देवी महापुराण में सृष्टी रचना का प्रमाण‘‘
‘‘ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव के माता-पिता’’ (दुर्गा और ब्रह्म के योग से ब्रह्मा,
विष्णु और शिव का जन्म)
पवित्र श्रीमद्देवी महापुराण तीसरा स्कन्द (गीताप्रैस गोरखपुर से
प्रकाशित, अनुवादकर्ता श्री हनुमानप्रसाद पोद्दार तथा चिमन लाल गोस्वामी
जी, पृष्ठ नं. 114 से)
पृष्ठ नं. 114 से 118 तक विवरण है कि कितने ही आचार्य भवानी को
सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण करने वाली बताते हैं। वह प्रकृति कहलाती है तथा ब्रह्म के
साथ अभेद सम्बन्ध है जैसे पत्नी को अर्धांगनी भी कहते हैं अर्थात् दुर्गा ब्रह्म
(काल) की पत्नी है। एक ब्रह्मण्ड की सृष्टी रचना के विषय में राजा श्री परीक्षित
के पूछने पर श्री व्यास जी ने बताया कि मैंने श्री नारद जी से पूछा था कि हे देवर्षे
! इस ब्रह्मण्ड की रचना कैसे हुई? मेरे इस प्रश्न के उत्तर में श्री नारद जी ने
कहा कि मैंने अपने पिता श्री ब्रह्मा जी से पूछा था कि हे पिता श्री इस ब्रह्मण्ड की
रचना आपने की या श्री विष्णु जी इसके रचयिता हैं या शिव जी ने रचा है?
सच-सच बताने की कृपा करें। तब मेरे पूज्य पिता श्री ब्रह्मा जी ने बताया कि
बेटा नारद, मैंने अपने आपको कमल के फूल पर बैठा पाया था, मुझे नहीं
मालूम इस अगाध जल में मैं कहाँ से उत्पन्न हो गया। एक हजार वर्ष तक पृथ्वी
का अन्वेषण करता रहा, कहीं जल का ओर-छोर नहीं पाया। फिर आकाशवाणी
हुई कि तप करो। एक हजार वर्ष तक तप किया। फिर सृष्टी करने की
आकाशवाणी हुई। इतने में मधु और कैटभ नाम के दो राक्षस आए, उनके भय
से मैं कमल का डण्ठल पकड़ कर नीचे उतरा। वहाँ भगवान विष्णु जी शेष शैय्या
पर अचेत पड़े थे। उनमें से एक स्त्री (प्रेतवत प्रविष्ट दुर्गा) निकली। वह
आकाश में आभूषण पहने दिखाई देने लगी। तब भगवान विष्णु होश में आए।
अब मैं तथा विष्णु जी दो थे। इतने में भगवान शंकर भी आ गए। देवी ने हमें
विमान में बैठाया तथा ब्रह्म लोक में ले गई। वहाँ एक ब्रह्मा, एक विष्णु तथा एक
शिव और देखा फिर एक देवी देखी,उसे देख कर विष्णु जी ने विवेक पूर्वक
निम्न वर्णन किया (ब्रह्म काल ने भगवान विष्णु को चेतना प्रदान कर दी, उसको
अपने बाल्यकाल की याद आई तब बचपन की कहानी सुनाई)।
पृष्ठ नं. 119-120 पर भगवान विष्णु जी ने श्री ब्रह्मा जी तथा श्री शिव जी से कहा कि यह हम तीनों की माता है, यही जगत् जननी प्रकृति देवी है। मैंने
इस देवी को तब देखा था जब मैं छोटा सा बालक था, यह मुझे पालने में झुला
रही थी।
तीसरा स्कंद पृष्ठ नं. 123 पर श्री विष्णु जी ने श्री दुर्गा जी की स्तुति करते
हुए कहा - तुम शुद्ध स्वरूपा हो, यह सारा संसार तुम्हीं से उद्भासित हो रहा है,
मैं (विष्णु), ब्रह्मा और शंकर हम सभी तुम्हारी कृपा से ही विद्यमान हैं। हमारा
आविर्भाव (जन्म) और तिरोभाव (मृत्यु) हुआ करता है अर्थात् हम तीनों देव
नाशवान हैं, केवल तुम ही नित्य (अविनाशी) हो, जगत जननी हो, प्रकृति देवी हो।
भगवान शंकर बोले - देवी यदि महाभाग विष्णु तुम्हीं से प्रकट (उत्पन्न)
हुए हैं तो उनके बाद उत्पन्न होने वाले ब्रह्मा भी तुम्हारे ही बालक हुए। फिर मैं
तमोगुणी लीला करने वाला शंकर क्या तुम्हारी संतान नहीं हुआ अर्थात् मुझे भी
उत्पन्न करने वाली तुम्हीं हो।
विचार करें :- उपरोक्त विवरण से सिद्ध हुआ कि श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु
जी, श्री शिव जी नाशवान हैं। मृत्युंजय (अजर-अमर) व सर्वेश्वर नहीं हैं तथा
दुर्गा (प्रकृति) के पुत्र हैं तथा ब्रह्म (काल-सदाशिव) इनका पिता है।
तीसरा स्कंद पृष्ठ नं. 125 पर ब्रह्मा जी के पूछने पर कि हे माता! वेदों में
जो ब्रह्म कहा है वह आप ही हैं या कोई अन्य प्रभु है ? इसके उत्तर में यहाँ तो
दुर्गा कह रही है कि मैं तथा ब्रह्म एक ही हैं। फिर इसी स्कंद के पृष्ठ नं. 129 पर
कहा है कि अब मेरा कार्य सिद्ध करने के लिए विमान पर बैठ कर तुम लोग
शीघ्र पधारो (जाओ)। कोई कठिन कार्य उपस्थित होने पर जब तुम मुझे याद
करोगे, तब मैं सामने आ जाऊँगी। देवताओं मेरा (दुर्गा का) तथा ब्रह्म का ध्यान
तुम्हें सदा करते रहना चाहिए। हम दोनों का स्मरण करते रहोगे तो तुम्हारे कार्य
सिद्ध होने में तनिक भी संदेह नहीं है।
उपरोक्त व्याख्या से स्वसिद्ध है कि दुर्गा (प्रकृति) तथा ब्रह्म (काल) ही
तीनों देवताओं के माता-पिता हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु व शिव जी नाशवान हैं व पूर्ण
शक्ति युक्त नहीं हैं।
तीनों देवताओं (श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी, श्री शिव जी) की शादी दुर्गा
(प्रकृति देवी) ने की। पृष्ठ नं. 128-129 पर, तीसरे स्कंद में पढ़ें।
‘‘पवित्रा शिव महापुराण में सृष्टी रचना का प्रमाण‘‘
(काल ब्रह्म व दुर्गा से विष्णु, ब्रह्मा व शिव की उत्पत्ति)
इसी का प्रमाण पवित्र श्री शिव पुराण गीता प्रैस गोरखपुर से प्रकाशित,
अनुवादकर्ता श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार, इसके अध्याय 6 रूद्र संहिता, पृष्ठ नं.
100 पर कहा है कि जो मूर्ति रहित परब्रह्म है, उसी की मूर्ति भगवान सदाशिव है। इनके शरीर से एक शक्ति निकली, वह शक्ति अम्बिका, प्रकृति (दुर्गा),
त्रिदेव जननी (श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी को उत्पन्न करने
वाली माता) कहलाई। जिसकी आठ भुजाऐं हैं। वे जो सदाशिव हैं, उन्हें शिव,
शंभू और महेश्वर भी कहते हैं। (पृष्ठ नं. 101 पर) वे अपने सारे अंगों में भस्म
रमाये रहते हैं। उन काल रूपी ब्रह्म ने एक शिवलोक नामक क्षेत्र का निर्माण
किया। फिर दोनों ने पति-पत्नी का व्यवहार किया जिससे एक पुत्र उत्पन्न
हुआ। उसका नाम विष्णु रखा (पृष्ठ नं. 102)।
फिर रूद्र संहिता अध्याय नं. 7 पृष्ठ नं. 103 पर ब्रह्मा जी ने कहा कि मेरी
उत्पत्ति भी भगवान सदाशिव (ब्रह्म-काल) तथा प्रकृति (दुर्गा) के संयोग से
अर्थात् पति-पत्नी के व्यवहार से ही हुई। फिर मुझे बेहोश कर दिया।
फिर रूद्र संहिता अध्याय नं. 9 पृष्ठ नं. 110 पर कहा है कि इस प्रकार
ब्रह्मा, विष्णु तथा रूद्र इन तीनों देवताओं में गुण हैं, परन्तु शिव (काल-ब्रह्म)
गुणातीत माने गए हैं।
यहाँ पर चार सिद्ध हुए अर्थात् सदाशिव (काल-ब्रह्म) व प्रकृति (दुर्गा) से
ही ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव उत्पन्न हुए हैं। तीनों भगवानों (श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु
जी तथा श्री शिव जी) की माता जी श्री दुर्गा जी तथा पिता जी श्री ज्योति
निरंजन (ब्रह्म) है। यही तीनों प्रभु रजगुण-ब्रह्मा जी, सतगुण-विष्णु जी,
तमगुण-शिव जी हैं।
”पवित्र बाईबल तथा पवित्र कुरान शरीफ में
सृष्टी रचना का प्रमाण“
इसी का प्रमाण पवित्र बाईबल में तथा पवित्र कुरान शरीफ में भी है।
कुरान शरीफ में पवित्र बाईबल का भी ज्ञान है, इसलिए इन दोनों पवित्र
सद्ग्रन्थों ने मिल-जुल कर प्रमाणित किया है कि कौन तथा कैसा है सृष्टी
रचनहार तथा उसका वास्तविक नाम क्या है।
पवित्र बाईबल (उत्पत्ति ग्रन्थ पृष्ठ नं. 2 पर, अ. 1ः20 - 2ः5 पर)
छटवां दिन :- प्राणी और मनुष्य : अन्य प्राणियों की रचना करके 26. फिर
परमेश्वर ने कहा, हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएं,
जो सर्व प्राणियों को काबू रखेगा। 27. तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के
अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न
किया, नर और नारी करके मनुष्यों की सृष्टी की।
29. प्रभु ने मनुष्यों के खाने के लिए जितने बीज वाले छोटे पेड़ तथा जितने
पेड़ों में बीज वाले फल होते हैं वे भोजन के लिए प्रदान किए हैं, (माँस खाना नहीं
कहा है।) सातवां दिन :- विश्राम का दिन : परमेश्वर ने छः दिन में सर्व सृष्टी की
उत्पत्ति की तथा सातवें दिन विश्राम किया।
पवित्र बाईबल ने सिद्ध कर दिया कि परमात्मा मानव सदृश शरीर में है,
जिसने छः दिन में सर्व सृष्टी की रचना की तथा फिर विश्राम किया।
पवित्र कुरान शरीफ (सुरत फुर्कानि 25, आयत नं. 52, 58, 59)
आयत 52 :- फला तुतिअल् - काफिरन् व जहिद्हुम बिही जिहादन् कबीरा
(कबीरन्)।।52।
इसका भावार्थ है कि हजरत मुहम्मद जी का खुदा (प्रभु) कह रहा है कि हे
पैगम्बर ! आप काफिरों (जो एक प्रभु की भक्ति त्याग कर अन्य देवी-देवताओं तथा
मूर्ति आदि की पूजा करते हैं) का कहा मत मानना, क्योंकि वे लोग कबीर को पूर्ण
परमात्मा नहीं मानते। आप मेरे द्वारा दिए इस कुरान के ज्ञान के आधार पर अटल
रहना कि कबीर ही पूर्ण प्रभु है तथा कबीर अल्लाह के लिए संघर्ष करना (लड़ना
नहीं) अर्थात् अडिग रहना।
आयत 58 :- व तवक्कल् अलल् - हरिल्लजी ला यमूतु व सब्बिह्
बिहम्दिही व कफा बिही बिजुनूबि िअबादिही खबीरा (कबीरा)।।58।।
भावार्थ है कि हजरत मुहम्मद जी जिसे अपना प्रभु मानते हैं वह अल्लाह
(प्रभु) किसी और पूर्ण प्रभु की तरफ संकेत कर रहा है कि ऐ पैगम्बर उस कबीर
परमात्मा पर विश्वास रख जो तुझे जिंदा महात्मा के रूप में आकर मिला था।
वह कभी मरने वाला नहीं है अर्थात् वास्तव में अविनाशी है। तारीफ के साथ
उसकी पाकी (पवित्र महिमा) का गुणगान किए जा, वह कबीर अल्लाह
(कविर्देव) पूजा के योग्य है तथा अपने उपासकों के सर्व पापों को विनाश करने
वाला है।
आयत 59 :- अल्ल्जी खलकस्समावाति वल्अर्ज व मा बैनहुमा फी सित्तति
अय्यामिन् सुम्मस्तवा अलल्अर्शि अर्रह्मानु फस्अल् बिही खबीरन्(कबीरन्)।।59।।
भावार्थ है कि हजरत मुहम्मद को कुरान शरीफ बोलने वाला प्रभु
(अल्लाह) कह रहा है कि वह कबीर प्रभु वही है जिसने जमीन तथा आसमान के
बीच में जो भी विद्यमान है सर्व सृष्टी की रचना छः दिन में की तथा सातवें दिन
ऊपर अपने सत्यलोक में सिंहासन पर विराजमान हो (बैठ) गया। उसके विषय
में जानकारी किसी (बाखबर) तत्वदर्शी संत से पूछो
उस पूर्ण परमात्मा की प्राप्ति कैसे होगी तथा वास्तविक ज्ञान तो किसी
तत्वदर्शी संत (बाखबर) से पूछो, मैं नहीं जानता।
उपरोक्त दोनों पवित्र धर्मों (ईसाई तथा मुसलमान) के पवित्र शास्त्रों ने
भी मिल-जुल कर प्रमाणित कर दिया कि सर्व सृष्टी रचनहार, सर्व पाप
विनाशक, सर्व शक्तिमान, अविनाशी परमात्मा मानव सदृश शरीर में आकार में तथा सत्यलोक में रहता है। उसका नाम कबीर है, उसी को अल्लाहु अकबिरू
भी कहते हैं।
आदरणीय धर्मदास जी ने पूज्य कबीर प्रभु से पूछा कि हे सर्वशक्तिमान!
आज तक यह तत्वज्ञान किसी ने नहीं बताया, वेदों के मर्मज्ञ ज्ञानियों ने भी
नहीं बताया। इससे सिद्ध है कि चारों पवित्र वेद तथा चारों पवित्र कतेब
(कुरान शरीफ आदि) झूठे हैं। पूर्ण परमात्मा ने कहा :-
कबीर, बेद कतेब झूठे नहीं भाई, झूठे हैं जो समझे नाहिं।
भावार्थ है कि चारों पवित्र वेद (ऋग्वेद - अथर्ववेद - यजुर्वेद - सामवेद)
तथा पवित्र चारों कतेब (कुरान शरीफ - जबूर - तौरात - इंजिल) गलत नहीं
हैं। परन्तु जो इनको नहीं समझ पाए वे नादान हैं।
“पूज्य कबीर परमेश्वर (कविर् देव) जी की
अमृतवाणी में सृष्टी रचना”
विशेष :- निम्न अमृतवाणी सन् 1403 से {जब पूज्य कविर्देव (कबीर
परमेश्वर) लीलामय शरीर में पाँच वर्ष के हुए} सन् 1518 {जब कविर्देव
(कबीर परमेश्वर) मगहर स्थान से सशरीर सतलोक गए} के बीच में लगभग
600 वर्ष पूर्व परम पूज्य कबीर परमेश्वर (कविर्देव) जी द्वारा अपने निजी
सेवक (दास भक्त) आदरणीय धर्मदास साहेब जी को सुनाई थी तथा धनी
धर्मदास साहेब जी ने लिपिबद्ध की थी। परन्तु उस समय के पवित्र हिन्दुओं
तथा पवित्र मुसलमानों के नादान गुरुओं (नीम-हकीमों) ने कहा कि यह
धाणक (जुलाहा) कबीर झूठा है। किसी भी सद् ग्रन्थ में श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु
जी तथा श्री शिव जी के माता-पिता का नाम नहीं है। ये तीनों प्रभु अविनाशी
हैं इनका जन्म मृत्यु नहीं होता। न ही पवित्र वेदों व पवित्र कुरान शरीफ
आदि में कबीर परमेश्वर का प्रमाण है तथा परमात्मा को निराकार लिखा है।
हम प्रतिदिन पढ़ते हैं। भोली आत्माओं ने उन विचक्षणों (चतुर गुरुओं) पर
विश्वास कर लिया कि सचमुच यह कबीर धाणक तो अशिक्षित है तथा गुरु
जी शिक्षित हैं, सत्य कह रहे होंगे। आज वही सच्चाई प्रकाश में आ रही है तथा
अपने सर्व पवित्र धर्मों के पवित्र सद्ग्रन्थ साक्षी हैं। इससे सिद्ध है कि पूर्ण
परमेश्वर, सर्व सृष्टी रचनहार, कुल करतार तथा सर्वज्ञ कविर्देव (कबीर
परमेश्वर) ही है जो काशी (बनारस) में कमल के फूल पर प्रकट हुए तथा 120
वर्ष तक वास्तविक तेजोमय शरीर के ऊपर मानव सदृश शरीर हल्के तेज का
बना कर रहे तथा अपने द्वारा रची सृष्टी का ठीक-ठीक (वास्तविक तत्व)
ज्ञान देकर सशरीर सतलोक चले गए। कृपा प्रेमी पाठक पढं़े निम्न अमृतवाणी
परमेश्वर कबीर साहेब जी द्वारा उच्चारित :-
धर्मदास यह जग बौराना। कोइ न जाने पद निरवाना।।
यहि कारन मैं कथा पसारा। जगसे कहियो राम नियारा।।
यही ज्ञान जग जीव सुनाओ। सब जीवों का भरम नशाओ।।
अब मैं तुमसे कहों चिताई। त्रयदेवन की उत्पति भाई।।
कुछ संक्षेप कहों गुहराई। सब संशय तुम्हरे मिट जाई।।
भरम गये जग वेद पुराना। आदि राम का भेद न जाना।।
राम राम सब जगत बखाने। आदि राम कोइ बिरला जाने।।
ज्ञानी सुने सो हिरदै लगाई। मूर्ख सुने सो गम्य ना पाई।।
माँ अष्टंगी पिता निरंजन। वे जम दारुण वंशन अंजन।।
पहिले कीन्ह निरंजन राई। पीछे से माया उपजाई।।
माया रूप देख अति शोभा। देव निरंजन तन मन लोभा।।
कामदेव धर्मराय सत्ताये। देवी को तुरतही धर खाये।।
पेट से देवी करी पुकारा। हे साहब मेरा करो उबारा।।
टेर सुनी तब हम तहाँ आये। अष्टंगी को बंद छुड़ाये।।
सतलोक में कीन्हा दुराचारि, काल निरंजन दिन्हा निकारि।।
माया समेत दिया भगाई, सोलह संख कोस दूरी पर आई।।
अष्टंगी और काल अब दोई, मंद कर्म से गए बिगोई।।
धर्मराय को हिकमत कीन्हा। नख रेखा से भगकर लीन्हा।।
धर्मराय किन्हाँ भोग विलासा। मायाको रही तब आसा।।
तीन पुत्र अष्टंगी जाये। ब्रह्मा विष्णु शिव नाम धराये।।
तीन देव विस्त्तार चलाये। इनमें यह जग धोखा खाये।।
पुरुष गम्य कैसे को पावै। काल निरंजन जग भरमावै।।
तीन लोक अपने सुत दीन्हा। सुन्न निरंजन बासा लीन्हा।।
अलख निरंजन सुन्न ठिकाना। ब्रह्मा विष्णु शिव भेद न जाना।।
तीन देव सो उनको धावें। निरंजन का वे पार ना पावें।।
अलख निरंजन बड़ा बटपारा। तीन लोक जिव कीन्ह अहारा।।
ब्रह्मा विष्णु शिव नहीं बचाये। सकल खाय पुन धूर उड़ाये।।
तिनके सुत हैं तीनों देवा। आंधर जीव करत हैं सेवा।।
अकाल पुरुष काहू नहिं चीन्हां। काल पाय सबही गह लीन्हां।।
ब्रह्म काल सकल जग जाने। आदि ब्रह्मको ना पहिचाने।।
तीनों देव और औतारा। ताको भजे सकल संसारा।।
तीनों गुणका यह विस्त्तारा। धर्मदास मैं कहों पुकारा।।
गुण तीनों की भक्ति में, भूल परो संसार।
कहै कबीर निज नाम बिन, कैसे उतरैं पार।।
उपरोक्त अमृतवाणी में परमेश्वर कबीर साहेब जी अपने निजी सेवक
श्री धर्मदास साहेब जी को कह रहे हैं कि धर्मदास यह सर्व संसार तत्वज्ञान
के अभाव से विचलित है। किसी को पूर्ण मोक्ष मार्ग तथा पूर्ण सृष्टी रचना का
ज्ञान नहीं है। इसलिए मैं आपको मेरे द्वारा रची सृष्टी की कथा सुनाता हूँ।
बुद्धिमान व्यक्ति तो तुरंत समझ जायेंगे। परन्तु जो सर्व प्रमाणों को देखकर
भी नहीं मानेंगे तो वे नादान प्राणी काल प्रभाव से प्रभावित हैं, वे भक्ति योग्य
नहीं। अब मैं बताता हूँ तीनों भगवानों (ब्रह्मा जी, विष्णु जी तथा शिव जी) की
उत्पत्ति कैसे हुई? इनकी माता जी तो अष्टंगी (दुर्गा) है तथा पिता ज्योति
निरंजन (ब्रह्म, काल) है। पहले ब्रह्म की उत्पत्ति अण्डे से हुई। फिर दुर्गा की
उत्पत्ति हुई। दुर्गा के रूप पर आसक्त होकर काल (ब्रह्म) ने गलती
(छेड़-छाड़) की, तब दुर्गा (प्रकृति) ने इसके पेट में शरण ली। मैं वहाँ गया
जहाँ ज्योति निरंजन काल था। तब भवानी को ब्रह्म के उदर से निकाल कर
इक्कीस ब्रह्मण्ड समेत 16 संख कोस की दूरी पर भेज दिया। ज्योति निरंजन
(धर्मराय) ने प्रकृति देवी (दुर्गा) के साथ भोग-विलास किया। इन दोनों के
संयोग से तीनों गुणों (श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी) की
उत्पत्ति हुई। इन्हीं तीनों गुणों (रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण
शिव जी) की ही साधना करके सर्व प्राणी काल जाल में फंसे हैं। जब तक
वास्तविक मंत्र नहीं मिलेगा, पूर्ण मोक्ष कैसे होगा ?
विशेष :- प्रिय पाठक विचार करें कि श्री ब्रह्मा जी श्री विष्णु जी तथ श्री
शिव जी की स्थिति अविनाशी बताई गई थी। सर्व हिन्दु समाज अभी तक
तीनों परमात्माओं को अजर, अमर व जन्म-मृत्यु रहित मानते रहे जबकि ये
तीनों नाशवान हैं। इन के पिता काल रूपी ब्रह्म तथा माता दुर्गा (प्रकृति/अष्टांगी)
हैं जैसा आप ने पूर्व प्रमाणों में पढ़ा यह ज्ञान अपने शास्त्रों में भी विद्यमान है
परन्तु हिन्दु समाज के कलयुगी गुरूओं, ऋषियों, सन्तों को ज्ञान नहीं। जो
अध्यापक पाठ्यक्रम (सलेबस) से ही अपरिचित है वह अध्यापक ठीक नहीं
(विद्वान नही) है, विद्यार्थियों के भविष्य का शत्रु है। इसी प्रकार जिन गुरूओं
को अभी तक यह नहीं पता कि श्री ब्रह्मा, श्री विष्णु तथा श्री शिव जी के
माता-पिता कौन हैं? तो वे गुरू, ऋषि,सन्त ज्ञान हीन हैं। जिस कारण से सर्व
भक्त समाज को शास्त्र विरूद्ध ज्ञान (लोक वेद अर्थात् दन्त कथा) सुना कर
अज्ञान से परिपूर्ण कर दिया। शास्त्राविधि विरूद्ध भक्तिसाधना करा के
परमात्मा के वास्तविक लाभ (पूर्ण मोक्ष) से वंचित रखा सबका मानव जन्म
नष्ट करा दिया क्योंकि श्री मद्भगवत गीता अध्याय 16 श्लोक 23.24 में यही
प्रमाण है कि जो शास्त्राविधि त्यागकर मनमाना आचरण पूजा करता है। उसे
कोई लाभ नहीं होता पूर्ण परमात्मा कबीर जी ने सन् 1403 से ही सर्व शास्त्रों युक्त ज्ञान अपनी अमृतवाणी (कविरवाणी) में बताना प्रारम्भ किया था। परन्तु
उन अज्ञानी गुरूओं ने यह ज्ञान भक्त समाज तक नहीं जाने दिया। जो
वर्तमान में स्पष्ट हो रहा है इससे सिद्ध है कि कर्विदेव (कबीर प्रभु) तत्वदर्शी
सन्त रूप में स्वयं पूर्ण परमात्मा ही आए थे।
”आदरणीय नानक साहेब जी की वाणी में
सृष्टी रचना का संकेत“
श्री नानक साहेब जी की अमृतवाणी, महला 1, राग बिलावलु,
अंश 1 (गु.ग्र. पृ. 839)
आपे सचु कीआ कर जोडि़। अंडज फोडि़ जोडि विछोड़।।
धरती आकाश कीए बैसण कउ थाउ। राति दिनंतु कीए भउ-भाउ।।
जिन कीए करि वेखणहारा।(3)
त्रितीआ ब्रह्मा-बिसनु-महेसा। देवी देव उपाए वेसा।।(4)
पउण पाणी अगनी बिसराउ। ताही निरंजन साचो नाउ।।
तिसु महि मनुआ रहिआ लिव लाई। प्रणवति नानकु कालु न खाई।।(10)
उपरोक्त अमृतवाणी का भावार्थ है कि सच्चे परमात्मा (सतपुरुष) ने
स्वयं ही अपने हाथों से सर्व सृष्टी की रचना की है। उसी ने अण्डा बनाया
फिर फोड़ा तथा उसमें से ज्योति निरंजन निकला। उसी पूर्ण परमात्मा ने सर्व
प्राणियों के रहने के लिए धरती, आकाश, पवन, पानी आदि पाँच तत्व रचे।
अपने द्वारा रची सृष्टी का स्वयं ही साक्षी है। दूसरा कोई सही जानकारी नहीं
दे सकता। फिर अण्डे के फूटने से निकले निरंजन के बाद तीनों श्री ब्रह्मा
जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी की उत्पत्ति हुई तथा अन्य देवी-देवता
उत्पन्न हुए तथा अनगिनत जीवों की उत्पत्ति हुई। उसके बाद अन्य देवों के
जीवन चरित्र तथा अन्य ऋषियों के अनुभव के छः शास्त्र तथा अठारह पुराण
बन गए। पूर्ण परमात्मा के सच्चे नाम (सत्यनाम) की साधना अनन्य मन से
करने से तथा गुरु मर्यादा में रहने वाले (प्रणवति) को श्री नानक जी कह रहे
हैं कि काल नहीं खाता।
राग मारु (अंश) अमृतवाणी महला 1 (गु.ग्र.पृ. 1037)
सुनहु ब्रह्मा, बिसनु, महेसु उपाए। सुने वरते जुग सबाए।।
इसु पद बिचारे सो जनु पुरा। तिस मिलिए भरमु चुकाइदा।।(3)
साम वेदु, रुगु जुजरु अथरबणु। ब्रहमें मुख माइआ है त्रौगुण।।
ता की कीमत कहि न सकै। को तिउ बोले जिउ बुलाईदा।।(9)
उपरोक्त अमृतवाणी का सारांश है कि जो संत पूर्ण सृष्टी रचना सुना
देगा तथा बताएगा कि अण्डे के दो भाग होकर कौन निकला, जिसने फिर ब्रह्मलोक की सुन्न में अर्थात् गुप्त स्थान पर ब्रह्मा-विष्णु-शिव जी की उत्पत्ति
की तथा वह परमात्मा कौन है जिसने ब्रह्म (काल) के मुख से चारों वेदों
(पवित्र ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद) को उच्चारण करवाया, वह पूर्ण
परमात्मा जैसा चाहे वैसे ही प्रत्येक प्राणी को बुलवाता है। इस सर्व ज्ञान को
पूर्ण बताने वाला सन्त मिल जाए तो उसके पास जाइए तथा जो सभी शंकाओं
का पूर्ण निवारण करता है, वही पूर्ण सन्त अर्थात् तत्वदर्शी है।
Tuesday, June 2, 2020
कबीर परमात्मा के द्वारा हनुमानजी का कल्याण करना।
परमेश्वर कबीर जी ने कहा त्रेता युग में मैंने हनुमान को भी शरण में लिया था।
प्रश्नः- धर्मदास ने प्रश्न किया हे कबीर परमेश्वर! आपने तो मेरे आश्चर्य
को अधिक बढ़ा दिया। श्री हनुमान जी को तो अपनी शक्ति तथा श्री राम की भक्ति पर अत्यधिक अभिमान था। हे दीनानाथ! आपने हनुमान जी की बुद्धि को
कैसे बदला? मुझ किकंर पर कृपा करके बताईए?
उत्तरः- कबीर परमेश्वर जी ने बताया हे धर्मदास! हनुमान जी लंका से
सीता जी की खोज करके लौटा उस के हाथ में सीता द्वारा दिया सोने का कंगन
था जिसे सीता जी अपने हाथ में चूडि़यों के स्थान पर पहनती थी। प्रातः काल का
समय था। जिस स्थान पर पवन पुत्र आकाश मार्ग से उड़कर इस ओर पृथ्वी पर
उतरा वह एक पर्वत था। उस के आने से पूर्व मैंने उस स्थान पर एक लीला की।
एक सुन्दर बाग स्वादिष्ट फलों से लदे वृक्षों वाला अपनी शक्ति से स्थापित
किया। उसी के एक कोने में स्वच्छ जल का सरोवर बनाया। दूसरे कोने में मैंने
अपनी कुटिया बनाई। कुटिया के साथ आंगन में एक बहुत बड़ा घड़ा रखा था।
हनुमान को भूख लगी थी। प्रथम स्नान करने लगा। सीता द्वारा दिया कंगन एक
पत्थर की शिला रख दिया। स्नान करते समय हनुमान जी की दृष्टि उस कंगन
पर ऐसे टिकी हुई थी जैसे ओस चाटते समय मणीधर सर्प अपनी मणी को मुख
से निकाल कर जमीन पर रख देता है। ओस चाटते समय एक नजर मणी पर
रखता है। कोई उसे उठा न ले। जैसे गाय चारा चरते समय भी एक टक दृष्टि
अपने बच्चे पर रखती है। यदि कोई अन्य पशु उस बच्चे की ओर जाता है तो
गाय उसे मारने को लपकती है। ठीक इसी प्रकार हनुमान के लिए वह कंगन
इतना अनिवार्य था। क्योंकि उस कंगन को पहचान कर ही श्री रामचन्द्र जी को
विश्वास हुआ कि वास्तव में सीता लंका पति रावण के बाग में कैद है। इसीलिए
लंका पर आक्रमण करने की सोची तथा समुद्र पर पुल का निर्माण किया। यदि
कंगन खो जाता तो श्री रामचन्द्र जी कभी भी हनुमान जी की बात पर विश्वास
नहीं करते तथा इतने बड़े समुद्र पर पुल बनाने का कठिन कार्य करने की नहीं
सोचते।
कबीर परमात्मा बता रहे हैं कि हे धर्मदास! यह सर्व विचार हनुमान के मन
में उठ रहे थे। यदि कंगन को किसी ने चुरा लिया तो मेरा सर्व प्रयत्न व्यर्थ हो
जाएगा। इसलिए स्नान करते-2 पल-2 में उस कंगन की ओर पल-2 में देख रहे
थे। एक बन्दर ने उस कंगन को उठा लिया तथा उसे ध्यान से देखने लगा।
हनुमान की दृष्टि भी उस बन्दर पर पड़ी। हनुमान तुरन्त बन्दर की ओर दौड़ा,
बन्दर भी दौड़ा, हनुमान ने सोचा यदि शरारती बन्दर ने यह कंगन समुद्र में फैंक
दिया तो मेरा सर्वकार्य नष्ट हो जाएगा, देखते-देखते उस बन्दर ने मेरे आश्रम में
प्रवेश किया तथा आंगन में रखे उस बड़े घड़े में वह कंगन डाल दिया तथा दौड़
गया। हनुमान ने देखा कि कंगन ऋषि के आश्रम में रखे घड़े में बन्दर ने डाल
दिया तो सुख की सांस ली। हनुमान ने घड़े में झांक कर देखा तो पाया कि उस
घड़े में उसी कंगन जैसे ढेर सारे कंगन पड़े थे। हनुमान पहचान नहीं सके कि वह कंगन कौन सा है जो मैं लाया था? अति दुःखी मन से आश्रम में बनी कुटिया की
ओर देखा। वहाँ मैं (कबीर परमेश्वर जी) एक ऋषि के रूप में विराजमान था।
मेरे निकट आकर बजरंग बली ने प्रणाम किया राम-राम बोला मैंने भी उसे
राम-राम बोला तथा कहा आओ अंजनी लाल मैं आपकी ही प्रतिक्षा कर रहा था।
अपना परिचय मुझ से सुन कर हनुमान के आश्चर्य की सीमा नहीं रही तथा वह
शब्द की ‘‘मैं आपकी प्रतिक्षा कर रहा था’’ और भी आश्चर्य में डाल रहा था।
अपनी समस्या से परेशान हनुमान ने इस आश्चर्य के विषय में कुछ नहीं पूछा।
उसने पूछा ऋषि वर श्री राम जी पर इस वक्त बहुत आपत्ति आई है। सीता माता
जी का अपहरण लंका पति रावण ने कर रखा है मैं उसकी खोज करके आया हूँ।
मैंने(कबीर परमेश्वर जी ने) प्रश्न किया हे बजरंग बली! आप कौन से श्री राम के
विषय में कह रहे हो? हनुमान बोला! हे ऋषिवर आप कौन सी दुनिया में रहते
हो। आपको यही नहीं पता कौन है श्री राम, क्या और भी श्री राम हैं? मैं राजा
दशरथ के पुत्र श्री रामचन्द्र जी के विषय में कह रहा हूँ जिन्हें चौदह वर्ष का
बनवास हुआ है। मैंने(कबीर परमेश्वर उर्फ मुनिन्द्र ऋषि ने) कहा हनुमान! मैं भी
उसी अयोध्या के राजा, दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र श्री रामचन्द्र के विषय में ही आप से
पूछ रहा हूँ? ऐसे श्री दशरथ पुत्र श्री रामचन्द्र करोड़ों, उत्पन्न होकर मर चुके हैं।
इसी प्रकार श्री राम को बनवास होता है, इसी प्रकार श्री सीता का अपहरण होता
है, इसी प्रकार आप जैसे हनुमान जी श्री सीता की खोज करके आते हैं।
इतनी बात मेरे मुख से सुनकर ब्रह्मचारी हनुमान कुपित होकर बोले ऋषि
जी! यह समय मजाक(उपहास) करने का नहीं है। आप व्यर्थ में मिथ्या भाषण
कर रहे हो, आप ऋषि के रूप में अज्ञानी विराजमान हो अन्यथा आप यह प्रश्न
नहीं करते कि कौन से श्री राम के विषय में बातें कर रहे हो पूरे वन व देश में चर्चा
चल रही है कि सीता जी का अपहरण होने से श्री रामचन्द्र जी अति व्याकुल हैं।
मैंने (कबीर परमेश्वर ने) प्रश्न किया हनुमान ! आप ने मेरे पास आने का
कष्ट किसलिए किया?
हनुमान बोला ऋषि जी ! मैंने बताया है कि मैं सीता माता की खोज करके
आया हूँ। माता ने अपने हाथ का कंगन (सोने का कड़ा) मुझे दिया था जिसे
पहचान कर श्री रामचन्द्र जी मुझ पर विश्वास करेंगे कि वह वास्तव में सीता जी
का ही कंगन है, अन्यथा वे मुझ पर विश्वास नहीं कर सकेंगे। वह कंगन स्नान
करते समय सरोवर के निकट पत्थर शिला पर रख दिया था। उसे एक बन्दर
उठाकर आप के आश्रम में रखे घड़े में डाल गया। मैं उसे लेने आया हूँ।
धर्मदास! मैंने हनुमान से कहा, आप आहार किजिए फिर अपना कंगन घड़े से
निकाल कर ले जाईए।
हनुमान बोला हे ऋषि जी ! मुझे भूख बहुत लगी थी परन्तु अब सब समाप्त हो गई है। आप के घड़े में बहुत सारे कंगन हैं। मैं पहचान नहीं पा रहा हूँ कि मेरे
वाला कंगन कौन सा है?
मैंने कहा आप पहचान भी नहीं सकोगे। क्योंकि ये सर्व कंगन आप जैसे
हनुमानों द्वारा लाए गए उन सीताओं के ही हैं जो पहले वाले श्री रामों के साथ
महान कष्ट भोग चुकी हैं। आप कोई एक कंगन उठा ले जाईए वही वर्तमान
वाली सीता वाले कंगण से मेल करेगा कोई भिन्नता नहीं है। वर्तमान वाले श्री
रामचन्द्र जैसे करोड़ों मर कर अन्य योनियों में चले गए हैं। हनुमान को कोई भी
रास्ता दिखाई नहीं दिया। उसने कंगन की वास्तविक्ता को पक्का करने के लिए
प्रश्न पूछा हे ऋषि जी ! आपने कहा कि अन्य श्री राम भी हुए है। उनकी भी पत्नी
सीता नाम से थी। इसी प्रकार लंका पति रावण ने अपहरण किया तथा मेरे जैसे
हनुमान इसी प्रकार सीता माता का कंगन लेकर आते थे। वे ही कंगन इस घड़े
में विद्यमान हैं। हे दीनदयाल! यह बात कैसे सत्य मानुं क्योंकि जो हनुमान कंगन
लाता होगा वह कंगन लेकर भी जाता होगा। फिर इस घड़े में कंगन कैसे रहेगा?
मैंने (कबीर परमेश्वर उर्फ मुनिन्द्र जी ने) कहा, पवन पुत्र हनुमान !
प्रत्येक बार बन्दर, हनुमान द्वारा लाए कंगन को उठाकर इस घड़े में डालता है।
इस घड़े में मेरी कृपा से ऐसी शक्ति है कि जो वस्तु इस में डाल दी जाती है। वह
एक जैसी दो बन जाती है। ऐसा कह कर मैंने एक पीतल की कटोरी उस घड़े में
डाली, डालते ही दो एक जैसी हो गई। यह देख कर हनुमान आश्चर्य चकित रह
गया। दोनों कटोरियों का मिलान करने लगा। कुछ भी अन्तर नहीं था। तब मैंने
कहा हनुमान! इसी प्रकार बन्दर द्वारा कंगन इस घड़े में डालते ही एक कंगन
और वैसा ही तैयार हो जाता है। आप निःसंकोच ले जाईए तथा श्री रामचन्द्र से
पहचान कराईए।
अब सुन तत्वज्ञान बजरंग बली! जिस दशरथ पुत्र श्री राम को आप सृष्टि
रचनहार सर्वशक्तिमान मानते हो यह तो सतगुण विष्णु का अवतार है।
ब्रह्मा-विष्णु तथा शिव ये नाशवान प्रभु हैं। इनके पिता काल ब्रह्म हैं जो इक्कीस
ब्रह्मण्डों के प्रभु(स्वामी) हैं। ब्रह्म से अधिक ब्रह्मण्डों का प्रभु परब्रह्म है। जो सात
संख ब्रह्मण्डों का स्वामी है। इन सर्व प्रभुओं का भी प्रभु(स्वामी) पूर्ण ब्रह्म
(सत्पुरूष) है। उस की पूजा से जीव का जन्म-मृत्यु का चक्र सदा के लिए
समाप्त हो जाता है। वह जीव सत्यलोक में चला जाता है। जहाँ जाने के पश्चात्
लौट कर इस संसार में नहीं आता अर्थात् पूर्ण मोक्ष प्राप्त करता है। धर्मदास!
मेरी चमत्कारी शक्ति से प्रभावित हनुमान उपरोक्त ज्ञान सुनता रहा। फिर
विनयपूर्वक कहा हे ऋषि जी! अब मेरे पास समय कम है। मेरे ऊपर बहुत बड़ी
जिम्मेवारी है। मैं पहले उससे मुक्त होना चाहता हूँ। एक बार सीता माता जी का
संदेश श्री राम जी को देकर सीता माता जी को लंका पति रावण के चुंगल से छुड़वाना है। आप के अमृतवचन फिर कभी सुनूंगा, मुझे आज्ञा दिजिए ऋषिवर्।
इतना कह कर हनुमान ने मेरे चरण लिए तथा एक कंगन उठा कर चला
गया। हनुमान के मन में फिर भी शंका थी, कहीं श्री राम यह न कह दें कि यह
कंगन सीता जी का नहीं है। हनुमान ने दूर से अतिहर्षित होकर आवाज लगाई
सीता माता का पता लगा कर आया हूँ। निकट आने पर हनुमान ने कहा हे प्रभु!
सीता माता को लंका पति रावण ने अपने नौलखे बाग में कैद कर रखा है। मैंने
उसका बाग भी उजाड़ दिया तथा लंका को भी आग के हवाले कर दिया। माता
सीता ने कहा है हे हनुमान! आप श्री राम को कहना मुझे शीघ्र कैद से मुक्त
कराऐं, मैं यहाँ पर महाकष्ट उठा रही हूँ। यह सब हनुमान से सुन कर श्री राम
बोले हे सन्त हनुमान! आप कोई निशानी बताओ जिस से मुझे विश्वास हो सके
कि जिस स्त्रा के विषय में आप कह रहे हो वह सीता ही है। श्री राम के ऐसा कहने
पर हनुमान ने संकोच युक्त मन से कहा यह लो माता जी की निशानी वह कंगन
(जो घड़े से निकाल कर लाया था) जो सीता जी द्वारा हनुमान को दिया था। श्री
राम के हाथ में थमा दिया। श्री राम ने ध्यान पूर्वक देखा कंगन सही है। श्री राम
ने हनुमान को सीने से लगा कर कहा हे प्रिय आत्मा हनुमान! आपने मुझ पर
महान् उपकार किया है। यह कंगन वास्तव में सीता का ही है। यदि आप कंगन
नहीं लाते तो मुझे विश्वास नहीं होता। जब श्री राम ने कंगन को वास्तविक
बताया तो हनुमान की खुशी का ठिकाना नहीं रहा तथा मेरा (ऋषि मुनिन्द्र का)
चेहरा तथा उनसे हुई वार्ता आँखों के सामने चलचित्र की तरह घूमने लगी।
हनुमान को लगा कि ऋषि परम सिद्धी युक्त है।
अरे बनचर क्या खबरां कपि ल्याये। कहु सीता की बात बिथा सब। क्या क्या भोजन
पाये।।टेक।। कैसी प्रीति करी तुम सेती, बिंजन कहा जिमाये। कहौ हनवंत संतजन
मेरे, भूखे रहें क धाये।।1।। कैसा बदन बिनोद सती का, बूझत हूं मन लाये। क्या
पौंनीक पटंबर पहरे। हार डोरि गल छ्याये ।।2।। कहा सिंगार उचार करत है,
रावण सिज्या जाये। सुरमा सिलकि सिज्या पैठी, ना तुम्ह बदन छिपाये।।3।। बोले
पौंनी होय स हौंनी, सुनि हो रघुपति राये। सीता सती अती अति आतुर, आंसुपात
चलि जाये।।4।। ढूंढत फिरा लंक चहूं औरा, नौलख बाग छिपाये। जाय बिरछ परि
छुबकी लाई, मुदरा भेंट चढाये।।5।। तहां प्रणाम करी सीता सौं, माता दर्शन पाये।
झरे परे का हुकम किया था, नौलख बाग अघाये।।6।। नाजुक बदन नाम तुम्हारे मैं,
जैसी माता जाये। रावण सेती प्रीति न जाकी, चंद बदन मुख छाये।।7।। पनंग
समेटि पदम आसन सैं, पौंना गगन चढाये। त्रिकुटी संजम ध्यान तास का, सूरज
कमल उगाये।।8।। हार डोरि नहीं पाट पटंबर, सीता मन मुरझाये। अगर मालवै
मूरति सूरति, गरीबदास पद गाये।।9।।
श्री राम के मन में विचार उठा, कि यदि सीता ने रावण को समर्पण कर दिया होगा तो मैं सीता के लिए युद्ध नहीं करूंगा, किसलिए दुनियाँ के लाल
मरवाऊँ। अपनी शंका के समाधान के लिए श्री राम ने अपने भक्त हनुमान से
घुमा फिरा कर बातें पूछी ताकि सीता के विषय में यथार्थ् जानकारी प्राप्त कर
सके। श्री राम ने हनुमान से पूछा हे मेरे प्यारे सन्त ! आप सीता के विषय में
बताऐं वह कैसी है? वह रावण के महल में रहती होगी ? हनुमान ने कहा नहीं
भगवान माता सीता तो रावण के नौलखा बाग में रहती है। श्री राम ने पूछा
आपने भोजन कहां खाया, सीता आपको रावण के महल में खिला कर लाई
होगी? हनुमान ने कहा नहीं भगवन् रावण के महल तक सीता माता की पहुँच
कहाँ, मैंने माता से कहा माता भूख लगी है। तब सीता माता ने कहा भाई
हनुमान! इस बाग का कोई फल तोड़ कर नहीं खाना, कोई नीचे गिरा हो केवल
वहीं खाना। यदि फल तोड़कर खा लिया और रावण के नौकरों को पता चल
गया तो मुझे बहुत यातना देगें। मैं भी जमीन पर पड़े फलों को ही खाती हूँ। मुझे
भी फल वृक्ष से तोड़कर खाने का आदेश नहीं। श्री राम ने पूछा हनुमान! सीता ने
सिंगार कर रखा होगा सुन्दर कीमती साड़ी पहन रखी होगी? रावण की सेज पर
सोती होगी ?
हनुमान ने कहा हे भगवन्! माता-सीता ने फटे-पुराने कपड़े पहन रखे थे।
जमीन पर बिछौना बिछा कर सोती है। हे भगवन्! मैं वृक्ष पर छुप कर बैठा था।
रावण अपने सैनिकों समेत आया तथा सीता से अपनी पत्नी बनने के लिए
विवश करने तथा भिन्न-2 प्रकार के वचन कहे। भय दिखाया अति त्रासदी माता
ने कहा रावण! मेरी जान जा सकती है इस तन को श्री राम अतिरिक्त कोई अन्य
पुरूष छू नहीं सकता। तू जितना चाहे कष्ट मुझे दे। रावण झख मार कर चला
गया। तब मैंने तोड़-2 कर फल खाए। रावण का बाग उखाड़ कर समुद्र में फैंक
दिया। रावण की लंका में आग लगा दी। जो नौकर-माता जी को परेशान करते
थे उनकी खूब खबर ली। सीता जी का चाँद जैसा चेहरा मुरझाए फूल की तरह
हो चुका है। वह तो आप की याद में खोई रहती है। आप की चर्चा के अतिरिक्त
उसे कोई बात अच्छी नहीं लगती। मेरे से आप के विषय में पूछा ‘‘श्रीराम कैसे
हैं?’’ मेरे वियोग में बहुत दुःखी होगें। हनुमान आप श्री राम के खाने पीने का
ध्यान रखना। वे बहुत अच्छे हैं। मेरे वियोग में रो-2 कर अति दुःखी रहते होंगे।
उन्हें मेरी राम-2 कहना तथा मेरी प्रार्थना करना की मुझे अति शीघ्र रावण की
कैद से छुड़ा लें। मैं उनके बिना अति परेशान हूँ। हनुमान के श्री मुख से
उपरोक्त वचन सुनकर श्री रामचन्द्र जी को विश्वास हो गया कि सीता का रावण
से कोई सम्बन्ध नहीं है। वह अति व्याकुल है। तब रावण से युद्ध करने की तैयारी
की तथा युद्ध जीत कर विभिषण को लंका का राज्य प्रदान किया। सीता की
अग्नि परीक्षा लेकर श्री राम अपनी पत्नी सीता के साथ पुष्पक विमान में बैठकर अयोध्या आऐ साथ भाई लक्ष्मण भी था। श्री राम को अयोध्या का राज्य भरत ने
सौंप दिया।
एक दिन सीता ने हनुमान को एक सच्चे मोतियों की बहुमुल्य माला दी।
हनुमान जी ने उस माला के मणके फोड़-2 कर जमीन पर फैंक दिए। सीता को
अच्छा नहीं लगा तथा क्रोधवश हनुमान के प्रति कटुवचन कहे। अरे हनुमान! तूने
इतनी कीमती माला का विनाश कर दिया। तू रहा बन्दर का बन्दर! यह
राजमहल वनचरों के लिए नहीं है। आज आप ने माला का नाश किया है। कल
अन्य बहुमूल्य वस्तुओं को नाश कर डालेगा। तुम तो बन में ही रहने योग्य हो।
हनुमान ने कहा हे माता! जिस वस्तु में राम नहीं वह वस्तु मेरे काम नहीं। मैंने
मोती को फोड़ कर देखा, उनमें राम नहीं लिखा था। इसलिए मेरे लिए मिट्टी है
और सुनों देवी आज आपने एक भक्त की आत्मा दुखाई है आप को इन महलों
का अभिमान हो गया है। आप भी इन महलों में नहीं रह सकोगी। आप का भी
सर्व जीवन जंगल में संतों के पास ही व्यतीत होगा। हनुमान जी ने सीता जी की
इस बात से नाराज होकर अयोध्या त्याग दी तथा एकान्त वास किया। सीता जी
भी अधिक समय अयोध्या नगरी में नहीं रह सकी। एक धोबी के व्यंग्य के कारण
श्री राम ने सीता जी का त्याग कर दिया। सीता जी ने वन में ऋषि वाल्मिकी जी
के आश्रम में शेष जीवन व्यतीत किया।
उस समय हनुमान जी अति विचलित थे। उसे संसार में कोई भी अपना
दिखाई नहीं दे रहा था। धर्मदास! तब मैं (कबीर परमेश्वर) हनुमान जी के पास
गया। मैंने राम-2 शब्द उच्चारण किया। हनुमान ने मेरी ओर देखा तथा उत्तर में
जय राम जी कहा, हनुमान ने कहा आओ ऋषि जी आप का चेहरा पहले कभी
मैंने देखा है, ध्यान नहीं आ रहा कहाँ देखा है? मैंने(कबीर परमेश्वर ने) कहा मैं
बताता हूँ आपने मुझे कहाँ देखा था। हनुमान ने मुझे बैठने को कहा। मैंने उसके
निकट बैठ कर वह कंगन वाली बात याद दिलाई तथा कहा मैं वही ऋषि हूँ। उस
समय हनुमान आप के पास तत्वज्ञान सुनने का वक्त नहीं था। अब आप के पास
पर्याप्त समय है। इसलिए मैं आपको पूर्ण परमात्मा के विषय में ज्ञान सुनाने के
लिए आया हूँ। यदि आप की रूचि हो तो चर्चा की जाए। हनुमान ने कहा
ऋषिवर! मैं आप का ज्ञान रूचि से सुनूंगा आप मुझे तत्वज्ञान सुनाओ।
मैंने हनुमान जी को सृष्टि रचना सुनाई हनुमान जी ने कहा ऋषि जी! आप के द्वारा
सुनाया गया ज्ञान पहले कभी नहीं सुना इसलिए मन मानने को तैयार नहीं है।
हनुमान के ऐसा कहते ही मैं अन्तर्धान हो गया। हनुमान मुझे हर दिशा में खोजने
लगा। जब ऊपर आकाश की ओर देखा तो मैंने उसे दिव्य दृष्टि प्रदान की
जिसके द्वारा हनुमान ने मुझे सतलोक के सिंहासन पर बैठे देखा। मेरे शरीर व सतलोक के तेज(प्रकाश) को देखकर हनुमान बहुत प्रभावित हुआ। कुछ समय
पश्चात् मैं फिर उससे पचास गज की दूरी पर एक वृक्ष के नीचे विराजमान
हुआ। मुझे देखकर महावीर हनुमान मेरे पास आया तथा प्रार्थना कि हे ऋषि
मुनिन्द्र! कृप्या मुझे आप के सतलोक के दर्शन कराईए। तब मैंने हनुमान को
धर्मदास आप की तरह सतलोक की सैर कराई। तब पहलवान को तत्वज्ञान
हुआ तथा मेरे चरण लिए, उपदेश के लिए प्रार्थना की कहा हे ऋषिवर! आप पूर्ण
परमात्मा हो आपने स्वयं को छुपाया हुआ है। कृप्या मुझे उपदेश दीजिए तथा वह
विधि बताईए जिससे सत्यलोक की प्राप्ति हो सके। हे धर्मदास! तब मैंने हनुमान
को नामदान दिया तथा अपना शिष्य बनाया। अंजनी पुत्रा ने नाशवान राम की
भक्ति त्यागकर अविनाशी राम अर्थात् मुझ पूर्णब्रह्म की भक्ति की जिससे
हनुमान का कल्याण हुआ।
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